मॉनसून की विदाई के साथ ही भारत के **52%** से ज्यादा हिस्से में सूखे जैसे हालात पैदा हो गए हैं। इसका सीधा असर रूरल डिमांड और फूड इन्फ्लेशन पर पड़ सकता है, जिससे निवेशकों की चिंता बढ़ गई है।
मॉनसून की विदाई और सूखे की मार
IIT गांधीनगर के 'इंडिया ड्राउट मॉनिटर' (India Drought Monitor) के 16 सितंबर के आंकड़ों के मुताबिक, देश का 52.5% इलाका नमी की कमी या सूखे की चपेट में है। यह आंकड़ा महज एक महीने पहले 38.9% था, यानी हालात तेजी से बिगड़े हैं। कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश जैसे कृषि-प्रधान राज्यों में स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर है।
खेती और रूरल मार्केट पर असर
आंकड़े बताते हैं कि धान की बुआई में पिछले साल के मुकाबले 17 लाख हेक्टेयर की कमी आई है। ग्रामीण आय घटने का सीधा असर FMCG कंपनियों और डिसक्रिशनरी स्पेंडिंग पर पड़ता है। जब किसानों की कमाई घटती है, तो रूरल डिमांड में सुस्ती आना तय है, जिसका असर लिस्टेड कंपनियों के सेल्स वॉल्यूम पर दिखेगा।
इन्फ्लेशन और RBI की चुनौतियां
खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ने का सीधा असर कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) पर होगा। अगर फूड इन्फ्लेशन अनियंत्रित रही, तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) को ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा बनाए रखना पड़ सकता है, जो बाजार के लिए एक नेगेटिव संकेत है।
रबी सीजन और El Niño का खतरा
आने वाले रबी सीजन के लिए भी चिंताएं बढ़ गई हैं क्योंकि देश का 55% से 60% खेती योग्य रकबा आज भी बारिश पर निर्भर है। ऊपर से El Niño का असर 2027 की शुरुआत तक बने रहने की आशंका है। निवेशक अब सरकारी डेटा और कंपनियों के रूरल कंजम्पशन रिपोर्ट्स पर अपनी नजरें जमाए हुए हैं, क्योंकि सरकार फूड प्राइसेज को कंट्रोल करने के लिए एक्सपोर्ट पर पाबंदियां जैसे कदम उठा सकती है।
