BRICS की कमान संभालते ही भारत ने अपनी प्राथमिकताएं साफ कर दी हैं। अब ध्यान सस्टेनेबल डेवलपमेंट, क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग और सस्ती ग्रीन फाइनेंसिंग पर रहेगा ताकि विकासशील देशों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
भारत के पास अब BRICS की कमान है और यह बदलाव उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए क्लाइमेट एक्शन और इंडस्ट्रियल ग्रोथ की दिशा बदल सकता है। अब 'एक समान' डीकार्बोनाइजेशन के बजाय, सदस्य देशों की जरूरतों और उनकी एनर्जी सिक्योरिटी को प्राथमिकता दी जाएगी ताकि आर्थिक विकास की रफ्तार कम न हो।
ऊर्जा सुरक्षा और लचीलापन
BRICS अब 'वन-साइज-फिट्स-ऑल' (One-size-fits-all) वाले एनर्जी ट्रांजिशन मॉडल को खारिज कर रहा है। इसके बजाय, अब स्मार्ट ग्रिड, हाइड्रोजन टेक्नोलॉजी और बेहतर एनर्जी स्टोरेज पर जोर दिया जा रहा है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि मेंबर देश अपनी गति से ऊर्जा की ओर बढ़ें, जिससे अचानक बिजली संकट या औद्योगिक बाधाएं पैदा न हों।
क्रिटिकल मिनरल्स और रिसोर्स संप्रभुता
ब्लॉक अब कच्चे माल (Raw Commodities) का केवल निर्यातक नहीं रहना चाहता। भारत की लीडरशिप में अब स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग यूनिट्स लगाने पर जोर है। इसका उद्देश्य ग्लोबल सप्लाई चेन को स्टेबल बनाना और प्राइस वोलैटिलिटी से बचना है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि क्रिटिकल रिसोर्सेज का इस्तेमाल जियो-पॉलिटिकल हथियारों की तरह नहीं, बल्कि स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करने के लिए किया जाना चाहिए।
क्लाइमेट फाइनेंस की चुनौती
सबसे बड़ी चुनौती $1.3 ट्रिलियन के उस क्लाइमेट फंड को जुटाने की है, जिसका लक्ष्य 2035 तक रखा गया है। इसके लिए सस्ती और आसान फाइनेंसिंग की दरकार है। इस मोर्चे पर 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' (New Development Bank) की भूमिका काफी अहम होने वाली है। निवेशकों की नजरें अब आगामी समिट्स पर हैं, जहां यह साफ होगा कि ये डिप्लोमैटिक वादे असल प्रोजेक्ट्स और फंड एलोकेशन में कैसे बदलेंगे।
