भारत सरकार ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) के लिए अपनी पहली नेशनल पॉलिसी का ड्राफ्ट तैयार कर रही है। बजट 2025 के बाद आए टैक्स रिफॉर्म्स और नए 'GCC 50' प्रोग्राम के चलते यह सेक्टर अब हाई-वैल्यू इनोवेशन और AI-संचालित ऑपरेशंस की ओर बढ़ रहा है। निवेशकों को इन नीतिगत बदलावों पर नज़र रखनी चाहिए कि ये क्षेत्रीय विस्तार और प्रतिभा की मांग को कैसे प्रभावित करते हैं।
GCC सेक्टर के लिए पहली बार बनेगी नेशनल पॉलिसी
भारत ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय नीति ढांचा तैयार कर रहा है। इस कदम का मकसद देश की स्थिति को हाई-वैल्यू कॉर्पोरेट सर्विसेज में एक ग्लोबल लीडर के रूप में मजबूत करना है। यह विकास यूनियन बजट 2025 में लाए गए टैक्स रिफॉर्म्स के बाद हुआ है, जिसने इन संस्थाओं के लिए रेगुलेटरी माहौल को सरल बनाया है। एक अंतर-मंत्रालयी समूह (inter-ministerial group) फिलहाल इस नीति का मसौदा तैयार कर रहा है ताकि इस सेक्टर को औपचारिक समर्थन मिल सके, जिसमें वर्तमान में देश भर में 2,100 से अधिक केंद्र (centers) शामिल हैं।
नवाचार, AI और हाई-वैल्यू पर जोर
यह नीतिगत फोकस ऐसे समय में आ रहा है जब यह उद्योग एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है। पारंपरिक रूप से लागत-बचत वाले बैक ऑफिस माने जाने वाले GCCs, तेजी से नवाचार (innovation), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), और स्ट्रेटेजिक प्रोडक्ट डेवलपमेंट के हब बन रहे हैं। इस बदलाव को उजागर करने के लिए, Fortune India और ANSR ने 'GCC 50: India’s Most Admired Capability Centres 2026' लॉन्च किया है। यह पहल सिर्फ कर्मचारियों की संख्या या ऑपरेशनल साइज के बजाय, केंद्रों के स्ट्रेटेजिक योगदान, गवर्नेंस और नवाचार के आधार पर उनका मूल्यांकन करती है।
बजट 2025: टैक्स के मोर्चे पर बड़ा बदलाव
फाइनेंशियल और रेगुलेटरी नजरिए से, यूनियन बजट 2025 एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। सरकार ने सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और R&D सहित विभिन्न IT सर्विसेज को एक ही कैटेगरी में समेकित (consolidated) किया, जिसमें 15.5% का यूनिफॉर्म सेफ हार्बर मार्जिन (safe harbor margin) लागू किया गया। इससे एक अनुमानित टैक्स माहौल बनता है, जो कंपनियों को कैपिटल खर्च की योजना अधिक स्पष्टता के साथ बनाने की सुविधा देता है। इसके अलावा, सरकार ने सेफ हार्बर की सीमा को बढ़ाकर ₹2,000 करोड़ कर दिया है, जिससे बड़े पैमाने के ऑपरेशंस के लिए अनुपालन का बोझ काफी कम हो गया है।
टियर II और टियर III शहरों में भी विस्तार
GCC फुटप्रिंट का विस्तार नए आर्थिक गलियारे भी बना रहा है। जहां बेंगलुरु, हैदराबाद और दिल्ली-एनसीआर जैसे हब अभी भी प्रमुख हैं, वहीं इंदौर और भुवनेश्वर जैसे टियर II और टियर III शहरों की ओर भी स्पष्ट रुझान दिख रहा है। कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों ने इस निवेश को आकर्षित करने के लिए अपनी नीतियां पेश की हैं, जो इंफ्रास्ट्रक्चर और स्पेशलाइज्ड टैलेंट दोनों को आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।
सेक्टर के सामने चुनौतियां
सकारात्मक गति के बावजूद, इस क्षेत्र को कुछ विशिष्ट चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है जिन पर बाजार पर्यवेक्षकों को नज़र रखनी चाहिए। हाई-वैल्यू AI और इंजीनियरिंग भूमिकाओं की ओर बदलाव के लिए एडवांस्ड स्किल्स वाले कार्यबल की आवश्यकता है, जिससे संभावित गैप पैदा हो सकते हैं जिन्हें फर्मों को भारी री-स्किलिंग निवेश के माध्यम से संबोधित करना होगा। इसके अतिरिक्त, यह क्षेत्र ग्लोबल आर्थिक स्थितियों और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संबंधों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है, जो एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सर्विसेज के विकास को प्रभावित कर सकते हैं। नीति मसौदा चरण के दौरान रेगुलेटरी अनिश्चितता और छोटे शहरों में इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा अन्य कारक हैं जो इस स्पेस में काम करने वाली कंपनियों के लिए दीर्घकालिक लाभप्रदता (profitability) को प्रभावित कर सकते हैं।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
निवेशकों के लिए अगला कदम राष्ट्रीय GCC नीति के अंतिम मसौदे की रिलीज पर नज़र रखना होगा। प्रमुख निगरानी योग्य (monitorables) में टियर II शहरों में काम करने वाले केंद्रों के लिए कोई विशिष्ट प्रोत्साहन, अंतर-मंत्रालयी समूह विदेशी निवेश की जरूरतों को घरेलू प्रतिभा की आवश्यकताओं के साथ कैसे संतुलित करता है, और क्या यूनिफॉर्म 15.5% मार्जिन इन केंद्रों के दीर्घकालिक कैश फ्लो और ऑपरेशनल स्थिरता में सुधार करने में मदद करता है, जैसे अपडेट शामिल होंगे।
