भारत सरकार ने **14** अलग-अलग सेक्टरों में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए कंपनियों को **₹36,754 करोड़** का भुगतान किया है। इस कदम से स्थानीय उत्पादन और एक्सपोर्ट में तेजी आने की उम्मीद है।
भारत सरकार की मैन्युफैक्चरिंग को आत्मनिर्भर बनाने की मुहिम ने एक बड़ा मुकाम हासिल कर लिया है। 2020 में शुरू की गई प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम के तहत अब तक ₹36,754 करोड़ की राशि वितरित की जा चुकी है। 30 जून तक के आंकड़ों के मुताबिक, इस योजना से कुल ₹23.79 ट्रिलियन का प्रोडक्शन और सेल्स दर्ज किया गया है, जिसमें से ₹15.53 ट्रिलियन का योगदान सिर्फ एक्सपोर्ट से आया है।\n\n### केपेक्स और लोकलाइजेशन को मिली रफ्तार\n\nPLI इंसेंटिव्स पूरी तरह से माइलस्टोन-बेस्ड होते हैं, यानी कंपनियों को पैसा तभी मिलता है जब वे निवेश और उत्पादन के तय लक्ष्य पूरे करती हैं। इस स्ट्रक्चर के कारण कंपनियों का कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) बढ़ रहा है। उदाहरण के तौर पर, स्पेशलिटी स्टील सेक्टर में Tata Steel, JSW और AMNS जैसी बड़ी कंपनियों ने ₹19,000 करोड़ से अधिक का नया निवेश किया है। वहीं, फार्मा सेक्टर में 1,931 नए प्रोडक्ट्स लॉन्च किए गए हैं और 191 बल्क ड्रग्स का पहली बार घरेलू स्तर पर उत्पादन शुरू हुआ है। मेडिकल डिवाइसेस सेगमेंट में Siemens, Wipro GE और Philips जैसी ग्लोबल कंपनियों के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के जरिए CT और MRI जैसे जटिल उपकरण अब भारत में असेंबल हो रहे हैं।\n\n### ऑपरेशनल बाधाएं होंगी कम\n\nसरकार सिर्फ पैसों से ही नहीं, बल्कि एडमिनिस्ट्रेटिव सुधारों से भी मैन्युफैक्चरिंग को सपोर्ट कर रही है। अब नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम पर 'e-B4' वीजा मॉड्यूल लॉन्च किया गया है, जिससे विदेशी टेक्निकल एक्सपर्ट्स को बुलाना और मशीनरी इंस्टॉलेशन का काम आसान हो गया है। पहले पेपरवर्क की दिक्कतों से प्रोजेक्ट्स में देरी होती थी, लेकिन अब ऑनलाइन स्पॉन्सरशिप लेटर मिलने से यह रुकावट दूर हो जाएगी।\n\n### निवेशकों के लिए आगे का रास्ता\n\nलंबी अवधि के लिहाज से निवेशकों को यह देखना होगा कि जब इंसेंटिव्स का दौर खत्म होगा, तब कंपनियां अपनी सस्टेनेबिलिटी कैसे बनाए रखती हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में Dell, HP, Lenovo और ASUS जैसी कंपनियां अपना ऑपरेशन बढ़ा रही हैं, लेकिन असली परीक्षा उनकी 'कॉस्ट कॉम्पिटिटिवनेस' और 'हाई यूटिलाइजेशन' की होगी।
