इकोनॉमिस्ट संतोष मेहरोत्रा और जाति परिडा ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर एक बड़ा अलर्ट जारी किया है। अनौपचारिक (informal) क्षेत्र में बढ़ रही नौकरियों के कारण भारत 'डेमोग्राफिक ट्रैप' की ओर बढ़ सकता है, जो निवेशकों के लिए चिंता का विषय है।
भारत के पास इस समय बड़ी युवा आबादी है, जिसे 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' कहा जाता है। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर हमने जल्द ही बेहतर क्वालिटी और फॉर्मल जॉब्स पैदा नहीं किए, तो यह ताकत बोझ में बदल सकती है।
क्यों चिंता में हैं एक्सपर्ट्स?
आमतौर पर एक मजबूत अर्थव्यवस्था में वर्कर एग्रीकल्चर सेक्टर से निकलकर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ओर बढ़ते हैं। लेकिन भारत में उल्टा हो रहा है। हाल के दिनों में कई लोग वापस खेती की ओर या कम आमदनी वाले स्वरोजगार (self-employment) में फंस गए हैं। यह डेटा में तो 'काम' जैसा दिखता है, लेकिन हकीकत में इसमें न तो उत्पादकता (productivity) है और न ही खर्च करने की क्षमता।
8-9% की ग्रोथ क्यों है जरूरी?
इन्वेस्टर्स के लिए यह समझना जरूरी है कि देश में हर साल लाखों युवा वर्कफोर्स में शामिल हो रहे हैं। इन्हें जॉब्स देने के लिए इकॉनमी को लगातार 8-9% की रफ्तार से बढ़ना होगा। यदि ग्रोथ कम रहती है, तो फॉर्मल सेक्टर में नौकरियां नहीं बनेंगी, और भारत 'अमीर होने से पहले बूढ़ा' (aging before getting wealthy) हो जाएगा।
मैन्युफैक्चरिंग में सुधार का रास्ता
एजुकेशन और इंडस्ट्री की जरूरत के बीच एक बड़ा फासला है। महिलाएं शिक्षित तो हो रही हैं, लेकिन उनके हुनर के मुताबिक जॉब्स नहीं हैं। एक्सपर्ट्स का सुझाव है कि भारत को लेबर-इंटेंसिव मैन्युफैक्चरिंग और इंडस्ट्रियल क्लस्टर्स पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
इन्वेस्टर्स क्या ट्रैक करें?
मार्केट में लंबी अवधि की मजबूती के लिए निवेशकों को इन तीन चीजों पर नजर रखनी चाहिए:
- मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ रेट।
- प्राइवेट कंजप्शन ट्रेंड्स।
- फॉर्मल एम्प्लॉयमेंट डेटा।
अगर वर्कफोर्स कम वैल्यू वाली अनौपचारिक नौकरियों से निकलकर मैन्युफैक्चरिंग की ओर शिफ्ट होती है, तभी कंज्यूमर गुड्स और फाइनेंशियल सेक्टर में टिकाऊ तेजी की उम्मीद की जा सकती है।
