भारत में डेटा सेंटर ऑपरेटर्स को मिलने वाले **20 साल** के टैक्स हॉलिडे ने इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश की रफ्तार बढ़ा दी है, लेकिन अब ये पॉलिसी AI रेगुलेशन के नए प्लान के सामने एक चुनौती बनकर खड़ी हो गई है।
भारत को एक ग्लोबल डिजिटल हब बनाने की कवायद में डेटा सेंटर्स के लिए भारी-भरकम टैक्स इंसेंटिव्स दिए गए हैं। 20 साल तक के टैक्स हॉलिडे का फायदा मिलने से कंपनियों की ऑपरेशनल कॉस्ट कम हुई है और कैपिटल पर रिटर्न (ROC) में बड़ा सुधार देखने को मिला है। यह सेक्टर भारी बिजली और स्टोरेज क्षमता की मांग करता है, जिसके लिए ये रियायतें बेहद जरूरी थीं।
नया नीतिगत संकट
अब अर्थशास्त्री और रेगुलेटर्स इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि क्या ये टैक्स सब्सिडी मॉडल AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) को रेगुलेट करने के लॉन्ग-टर्म गोल के साथ मेल खाते हैं? जानकारों का मानना है कि डेटा और कंप्यूटिंग पावर एक-दूसरे के पूरक (complementary) हैं—जैसे गाड़ी और पेट्रोल। आर्थिक सिद्धांतों के अनुसार, उपयोग और डिमांड को कंट्रोल करने के लिए इनमें से किसी एक पर टैक्स लगाना एक प्रभावी तरीका हो सकता है।
निवेशकों के लिए अनिश्चितता
अगर सरकार भविष्य में AI के खतरों को कम करने के लिए डेटा इंजेशन और कंप्यूटिंग पावर पर टैक्स लगाने का फैसला करती है, तो मौजूदा टैक्स हॉलिडे और सरकारी नियमों के बीच सीधा टकराव हो सकता है। फिलहाल निवेशकों के लिए कोई तत्काल खतरा नहीं है, लेकिन भविष्य की पॉलिसी में अनिश्चितता जरूर बढ़ गई है।
आगे क्या होगा?
इन्वेस्टर्स को अब 'नेशनल डेटा सेंटर पॉलिसी' में होने वाले संशोधनों और डेटा उपयोग पर किसी भी तरह की लेवी (levy) या टैक्स चर्चा पर पैनी नजर रखनी होगी। डिजिटल सेक्टर के लिए आने वाले समय में फिस्कल पॉलिसीज और ज्यादा कॉम्प्लेक्स हो सकती हैं।
