भारत का कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर साल 2030 तक **₹3.25 लाख करोड़** का लक्ष्य लेकर चल रहा है। **8-10%** की सालाना ग्रोथ की उम्मीद के बीच, सेक्टर के सामने मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट को लेकर कुछ गंभीर चुनौतियां भी हैं, जिन पर निवेशकों को पैनी नजर रखनी चाहिए।
भारत का कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर, जिसमें होम अप्लायंसेज और इलेक्ट्रॉनिक्स शामिल हैं, तेजी से विस्तार की ओर अग्रसर है। उम्मीद है कि साल 2030 तक इस इंडस्ट्री की वैल्यू ₹3.25 लाख करोड़ तक पहुंच जाएगी। घरेलू बाजार में बढ़ती डिस्पोजेबल इनकम के कारण वॉशिंग मशीन, रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर जैसी चीजों की मांग में भारी उछाल दिख रहा है, जिससे 8% से 10% की सालाना ग्रोथ का अनुमान है। हालांकि, इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सेक्टर को मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी के मोर्चे पर कई बाधाओं को पार करना होगा।
मैन्युफैक्चरिंग और इम्पोर्ट की चुनौती
भारतीय कंपनियों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द विदेशी पुर्जों पर निर्भरता है, खासकर टेलीविजन और एयर कंडीशनर के मामले में। अभी भी जटिल उपकरणों के लिए कच्चे माल का एक बड़ा हिस्सा बाहर से आता है। इस निर्भरता को कम करने के लिए क्लस्टर-आधारित मैन्युफैक्चरिंग और कंप्रेसर व डिस्प्ले पैनल जैसे महत्वपूर्ण पुर्जों को स्थानीय स्तर पर बनाने पर निवेश बढ़ाने की जरूरत है।
सरकार की PLI (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) स्कीम इस दिशा में एक बड़ा कदम है। निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि अगर कंपनियां स्थानीय स्तर पर उत्पादन नहीं बढ़ा पाईं, तो उनका प्रॉफिट मार्जिन करेंसी उतार-चढ़ाव और इम्पोर्ट कॉस्ट के कारण दबाव में रह सकता है।
एक्सपोर्ट और R&D का पेच
घरेलू बिक्री में उछाल के बावजूद, वैश्विक एक्सपोर्ट मार्केट में भारत की हिस्सेदारी अभी 1% से कम है। थाईलैंड जैसे देशों ने एयर कंडीशनर एक्सपोर्ट के लिए एक मजबूत इकोसिस्टम बनाया है, जबकि भारत को अभी टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और बैकवर्ड इंटीग्रेशन (इन-हाउस पार्ट्स बनाना) पर काफी काम करना बाकी है।
इसके अलावा, रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) में निवेश की कमी भी एक चिंता का विषय है। भारतीय कंपनियां अपने रेवेन्यू का 1% से भी कम हिस्सा इनोवेशन पर खर्च कर रही हैं, जबकि वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा 1% से 4% तक है। भविष्य में वही कंपनियां लंबी रेस का घोड़ा साबित होंगी जो न केवल असेंबली बल्कि टेक्नोलॉजी लीडरशिप पर ध्यान देंगी। निवेशकों के लिए फैक्ट्री कैपेसिटी का इस्तेमाल और PLI प्रोजेक्ट्स की प्रोग्रेस पर नजर रखना बेहद जरूरी है।
