भारत का **1,506 किलोमीटर** लंबा Western Dedicated Freight Corridor अब पूरी तरह ऑपरेशनल हो गया है। **₹20,700 करोड़** के इस मेगा प्रोजेक्ट से माल ढुलाई की रफ्तार बढ़ेगी और लॉजिस्टिक्स खर्च में भारी कमी आएगी।
भारत ने अपने महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, Western Dedicated Freight Corridor (WDFC) को पूरा कर एक बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। अंतिम 326 किलोमीटर के हिस्से के शुरू होने के साथ ही अब पूरा 1,506 किलोमीटर लंबा वेस्टर्न नेटवर्क काम करने लगा है। इस प्रोजेक्ट के तहत साणंद, मकरपुरा, न्यू उमरगांव और जवाहरलाल नेहरू पोर्ट (JNPT) जैसे महत्वपूर्ण जंक्शन अब सीधे जुड़ गए हैं।
लॉजिस्टिक्स में बड़ा बदलाव
इस कॉरिडोर के साथ अब भारत के पास कुल 2,843 किलोमीटर का एक डेडिकेटेड फ्रेट नेटवर्क (Eastern और Western दोनों) तैयार है। पहले मालगाड़ियों और पैसेंजर ट्रेनों के एक ही ट्रैक पर चलने के कारण भारी कंजेशन होता था, लेकिन अब मालगाड़ियों के लिए अलग और हाई-कैपेसिटी ट्रैक होने से माल की आवाजाही न केवल तेज होगी, बल्कि सस्ती भी हो जाएगी। यह गुजरात और महाराष्ट्र के औद्योगिक केंद्रों के लिए गेम-चेंजर साबित होगा।
इंडस्ट्री पर असर
हालांकि Dedicated Freight Corridor Corporation of India Limited (DFCCIL) एक सरकारी उपक्रम है, लेकिन इसका फायदा प्राइवेट लॉजिस्टिक्स कंपनियों, कंटेनर रेल ऑपरेटर्स और पोर्ट सर्विसेज को मिलेगा। माल ढुलाई का टर्नअराउंड टाइम घटने से प्राइवेट प्लेयर्स अपनी एसेट का बेहतर इस्तेमाल कर पाएंगे, जिससे वॉल्यूम में बढ़ोतरी की उम्मीद है।
चुनौतियां और भविष्य
इस बड़े नेटवर्क के पूरी तरह ऑपरेशनल होने के बाद अब असली चुनौती इसके मेंटेनेंस और प्राइवेट ऑपरेटर्स द्वारा इसकी स्वीकार्यता की होगी। क्या कंपनियां सड़क मार्ग को छोड़कर रेल नेटवर्क का ज्यादा उपयोग करेंगी? यह देखने वाली बात होगी। साथ ही, सरकार की ट्रैक एक्सेस पॉलिसी और सर्विस की गुणवत्ता पर ही इस कॉरिडोर की लंबी अवधि की सफलता टिकी है।
