सरकार ने नेशनल रिसर्च, डेवलपमेंट और इनोवेशन (RDI) स्कीम के तहत **19** फंड मैनेजर्स को **₹7,131 करोड़** की मंजूरी दी है। इस पहल का मकसद डीप-टेक प्रोजेक्ट्स को लैब से निकालकर मार्केट-रेडी बनाना है।
बड़ा कदम: लैब से मार्केट तक का सफर
सरकार का यह फैसला 8 अक्टूबर 2026 को 'एम्पावर्ड ग्रुप ऑफ सेक्रेटरीज' की बैठक में लिया गया। यह ₹1 लाख करोड़ के उस बड़े रिसर्च कॉर्पस का हिस्सा है, जिसे नवंबर 2025 में लॉन्च किया गया था। इस स्कीम की कमान 'अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन' संभाल रहा है।
कौन हैं ये 19 सिलेक्टेड मैनेजर्स?
इस पहले चरण में 14 अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIF) और 5 फोकस्ड रिसर्च ऑर्गनाइजेशन्स को चुना गया है। इनका मुख्य फोकस ऐसी टेक्नोलॉजीज पर होगा जो बेसिक लैब टेस्टिंग पार कर चुकी हैं (Technology Readiness Level 4 और उससे ऊपर)।
प्राइवेट कैपिटल की शर्त
सरकार ने इस फंड को लेकर एक सख्त लेकिन स्मार्ट नियम बनाया है। हर ₹1 जो सरकार देगी, फंड मैनेजर्स को उतना ही निवेश प्राइवेट सोर्सेज से जुटाना होगा। इससे दो बड़े फायदे होंगे:
- कुल फंड का पूल दोगुना हो जाएगा।
- प्रोजेक्ट्स की छंटनी मार्केट एक्सपर्ट्स द्वारा की जाएगी, जिससे फिजूलखर्ची रुकेगी।
रिस्क और चुनौतियां
डीप-टेक रिसर्च में असफलता की दर ज्यादा होती है और रिजल्ट आने में लंबा समय लगता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस स्कीम की सफलता पूरी तरह से फंड मैनेजर्स की काबिलियत पर टिकी है। अगर वे प्राइवेट निवेशकों को आकर्षित करने में नाकाम रहे, तो फंड का वितरण धीमा पड़ सकता है। हालांकि, सरकार का लक्ष्य भारत को टेक्नोलॉजी के मामले में आत्मनिर्भर बनाकर इंपोर्ट पर निर्भरता कम करना है।
