नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS समिट में भारत ने आधिकारिक तौर पर साफ कर दिया है कि किसी कॉमन करेंसी का कोई प्रस्ताव नहीं है। अब ग्रुप का फोकस लोकल करेंसी में ट्रेड सेटलमेंट और पेमेंट सिस्टम को आसान बनाने पर है।
क्या है नई रणनीति?
18वें BRICS समिट के दौरान विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि किसी भी तरह की साझा रिजर्व करेंसी की कोई योजना नहीं है। इसके बजाय, सदस्य देश व्यावहारिक और आसान विकल्पों पर काम कर रहे हैं। सदस्य देशों के अलग-अलग आर्थिक हितों को देखते हुए एक सिंगल करेंसी फिलहाल संभव नहीं है।
लोकल ट्रेड से क्या होगा फायदा?
अब पूरा ध्यान 'लोकल-करेंसी ट्रेड सेटलमेंट' पर है। इससे सदस्य देशों को अपने खुद की करेंसी में व्यापार करने की आजादी मिलेगी। इसका सीधा असर अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के रूप में दिखेगा। व्यवसायों के लिए इसका सबसे बड़ा फायदा ट्रांजैक्शन कॉस्ट (Transaction Cost) में आने वाली कमी होगी।
BRICS पेमेंट टास्क फोर्स का एक्शन प्लान
फिलहाल 'BRICS पेमेंट टास्क फोर्स' मौजूद मैसेजिंग चैनलों और पेमेंट सिस्टम के बीच इंटर-ऑपरेबिलिटी (Inter-operability) पर काम कर रही है। ठीक उसी तरह, जैसे भारत में UPI ने पेमेंट को आसान बनाया है, उसी तरह इंटरनेशनल स्तर पर पेमेंट्स को तेज और पारदर्शी बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
भारतीय व्यापारियों के लिए यह एक बड़ा बदलाव हो सकता है, लेकिन इसमें चुनौतियां भी हैं। डॉलर के बाहर ट्रेड करने पर एक्सचेंज रेट में उतार-चढ़ाव का रिस्क (Volatility Risk) बना रहेगा। साथ ही, कुछ देशों की करेंसी की लिक्विडिटी और कन्वर्टिबिलिटी की सीमाएं भी एक चुनौती हो सकती हैं। बाजार की नजरें अब BRICS पेमेंट टास्क फोर्स की प्रोग्रेस पर टिकी होंगी कि कैसे ये देश अपने रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को एक साथ लाते हैं।
