भारत ने घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए चीनी इंटरमीडिएट गुड्स के आयात में नरमी के संकेत दिए हैं। अप्रैल से सितंबर **2026** के बीच दोनों देशों के बीच व्यापार **$91.76 बिलियन** तक पहुंच गया है। हालांकि, चीन द्वारा मशीनरी पर लगाए गए एक्सपोर्ट कंट्रोल्स से बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के अटकने का जोखिम बढ़ गया है, जिस पर निवेशकों को नजर रखने की जरूरत है।
भारत अपनी ट्रेड पॉलिसी में बदलाव कर रहा है और अब मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को सपोर्ट करने के लिए जरूरी कच्चे माल और इंटरमीडिएट गुड्स के आयात के लिए रास्ता खोल रहा है। कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल ने इस बात की पुष्टि की है कि सरकार का मुख्य लक्ष्य घरेलू मांग को पूरा करना है, साथ ही साथ 'अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस' पर पैनी नजर रखना भी जारी रहेगा। यह कदम दोनों देशों के बीच हुई हालिया कूटनीतिक बातचीत के बाद उठाया गया है, जो 2020 के तनाव के बाद रिश्तों में आए बदलाव को दर्शाता है।
व्यापार के आंकड़े और चुनौतियां
आंकड़े बताते हैं कि दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्ते कितने गहरे हैं। अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच द्विपक्षीय व्यापार $91.76 बिलियन तक पहुंच गया है, जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 29% अधिक है। फिलहाल चीन भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर बना हुआ है, लेकिन चिंता की बात $99.19 बिलियन का ट्रेड डेफिसिट है जो फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में दर्ज किया गया था। निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भारत की मैन्युफैक्चरिंग अभी भी चीनी सामानों पर अत्यधिक निर्भर है।
इंफ्रास्ट्रक्चर पर रिस्क
चीन ने कुछ महत्वपूर्ण मशीनरी, जैसे कि टनल बोरिंग मशीन्स (TBM) के एक्सपोर्ट पर कंट्रोल लगा दिया है, जो हाई-स्पीड रेल और मेट्रो प्रोजेक्ट्स के लिए जरूरी हैं। इन पाबंदियों के कारण सप्लाई चेन में बड़ी बाधा आ सकती है, जिससे इंडियन इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के प्रोजेक्ट्स में देरी और लागत बढ़ सकती है। सरकार अभी इन पाबंदियों के असर का आकलन कर रही है।
निवेशकों के लिए क्या है जरूरी?
कॉमर्स मिनिस्ट्री ने साफ किया है कि वह घरेलू उद्योगों को बचाने के लिए लीगल फ्रेमवर्क का इस्तेमाल करती रहेगी। निवेशकों को अब सप्लाई चेन की स्थिरता, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की टाइमलाइन और इंपोर्ट ड्यूटी में बदलाव जैसे कारकों पर कड़ी नजर रखनी होगी।
