फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में भारत का चीन के साथ ट्रेड डेफिसिट बढ़कर **$99.19 अरब** पहुंच गया है। नई दिल्ली में शुरू हुए 18वें BRICS समिट के बीच यह मुद्दा सप्लाई चेन और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।
नई दिल्ली में 18वें BRICS समिट की शुरुआत हो चुकी है, जहां आर्थिक सहयोग मुख्य एजेंडा है। हालांकि, इस बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक चिंताजनक तस्वीर भी सामने आई है। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक, दोनों देशों के बीच कुल ट्रेड $127.7 अरब रहा, जिसमें से ट्रेड डेफिसिट $99.19 अरब पर पहुंच गया है। निवेशकों और नीति निर्माताओं के लिए यह घाटा एक बड़ा सिरदर्द बना हुआ है।
इंडस्ट्री की चीन पर निर्भरता
इस ट्रेड डेफिसिट की सबसे बड़ी वजह कंज्यूमर गुड्स नहीं, बल्कि औद्योगिक जरूरतें हैं। चीन से होने वाले कुल इंपोर्ट का 98.5% हिस्सा इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और ऑर्गेनिक केमिकल्स जैसे जरूरी इनपुट्स हैं। ये वे कच्चा माल हैं, जिनके बिना भारतीय कारखाने ठप पड़ सकते हैं। घरेलू मैन्युफैक्चरर्स के लिए ये कंपोनेंट्स इतने अहम हैं कि भारत की सप्लाई चेन गहराई से चीन से जुड़ी हुई है। निवेशकों के लिए जोखिम यह है कि अगर सप्लाई चेन में कोई बाधा आई, तो कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर सीधा असर पड़ सकता है।
FDI पॉलिसी में बड़ा बदलाव
नियामकीय मोर्चे पर भी बदलाव देखने को मिले हैं। मार्च 2026 में, भारतीय कैबिनेट ने FDI पॉलिसी में 'प्रेस नोट 3' (Press Note 3) में संशोधन किया है। इसके तहत चीन जैसे सीमा साझा करने वाले देशों से 10% तक की ओनरशिप के लिए ऑटोमैटिक रूट को मंजूरी दी गई है। साथ ही, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए 60 दिन का फास्ट-ट्रैक अप्रूवल सिस्टम भी लागू किया गया है।
अब बाजार की नजर इस बात पर है कि PLI स्कीम जैसे सरकारी कदम कब तक इस निर्भरता को कम कर पाते हैं। क्या भारत इन महत्वपूर्ण इनपुट्स का उत्पादन घर में शुरू कर पाएगा? यह आने वाले समय में निवेशकों के लिए सबसे बड़ा मॉनिटरेबल पॉइंट रहने वाला है।
