भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा चालू फाइनेंशियल ईयर के शुरुआती 5 महीनों में ही **$56 बिलियन** के स्तर पर पहुंच गया है। इसकी मुख्य वजह इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) बैटरी और ऑटो पार्ट्स का बढ़ा हुआ आयात है, जो घरेलू मैन्युफैक्चरिंग के लिए बड़ी चुनौती पेश कर रहा है।
भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा चालू फाइनेंशियल ईयर के शुरुआती पांच महीनों में ही $56 बिलियन पहुंच गया है, जो देश की इकोनॉमी के लिए एक गंभीर स्ट्रक्चरल चुनौती है। मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स के डेटा के मुताबिक, चीन से आयात, निर्यात की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा है। यदि यह रफ्तार जारी रही, तो यह पिछले साल के $112 बिलियन के रिकॉर्ड घाटे को भी पीछे छोड़ सकता है।
EV बैटरी और निर्भरता का संकट
इलेक्ट्रिक व्हीकल सेक्टर इस आयात उछाल का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। अप्रैल से अगस्त के बीच चीन से बैटरी आयात दोगुना होकर $2.9 बिलियन हो गया है। हालांकि सरकार PLI स्कीम के जरिए देश में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे रही है, लेकिन हकीकत यह है कि ज्यादातर कंपनियां अभी भी चीनी सेल का उपयोग कर रही हैं। निवेशकों के लिए यह एक रिस्क है, क्योंकि किसी भी प्रकार की ट्रेड बाधा या सप्लाई चेन में देरी का सीधा असर इन कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ेगा।
अन्य सेक्टरों पर असर
बैटरी के अलावा, दोपहिया और तिपहिया वाहनों का आयात भी पिछले साल के $2 मिलियन से उछलकर $107 मिलियन हो गया है। वहीं, कारों का आयात ढाई गुना बढ़कर $226 मिलियन के स्तर पर पहुंच गया है। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मास्युटिकल इंटरमीडिएट्स में भी चीन पर निर्भरता लगातार बनी हुई है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
यह बढ़ता व्यापार घाटा घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को बढ़ाने में आ रही दिक्कतों को दर्शाता है। जो कंपनियां अपनी सप्लाई चेन को डायवर्सिफाई (Diversify) कर रही हैं या जिनका लोकल सोर्सिंग पर ज्यादा जोर है, वे आने वाले समय में ट्रेड वोलेटिलिटी को बेहतर ढंग से झेल पाएंगी। निवेशकों को अब कंपनियों की उस रिपोर्ट पर ध्यान देना चाहिए, जिसमें उनके 'लोकल सोर्सिंग रेशियो' और मैन्युफैक्चरिंग प्लांट के विस्तार की जानकारी दी गई हो।
