12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में हुए BRICS समिट के बाद भारत और चीन के बीच के आर्थिक अंतर साफ नजर आने लगे हैं। जहां चीन अपने स्टेट-ड्रिवन मॉडल पर टिका है, वहीं भारत ने 'स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी' और स्टेबिलिटी का रास्ता चुना है।
नई दिल्ली में आयोजित BRICS समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई बातचीत का फोकस भले ही आपसी प्रतिस्पर्धा और सीमा विवादों को कम करने पर रहा हो, लेकिन गहराई में दोनों देशों के आर्थिक ढांचे में बढ़ती दूरी किसी से छिपी नहीं है।
चीन का सरकारी मॉडल और जोखिम
चीन का आर्थिक विकास काफी हद तक सरकारी हस्तक्षेप, भारी सब्सिडी और पूंजी-गहन (Capital-intensive) प्रोजेक्ट्स पर निर्भर है। इस मॉडल ने उन्हें तेज रफ्तार तो दी है, लेकिन अब इसमें सिस्टम की कमियां और सरकार पर अत्यधिक निर्भरता जैसे बड़े जोखिम भी सामने आ रहे हैं। यह केंद्रीकृत नियंत्रण (Centralized control) लंबे समय में चुनौतियों का कारण बन सकता है।
भारत की 'स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी'
दूसरी तरफ, भारत 'स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी' और संस्थागत स्थिरता (Institutional stability) पर काम कर रहा है। दशकों की मेहनत से भारत ने खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा का जो मजबूत कवच बनाया है, वह ग्लोबल सप्लाई चेन के झटकों को झेलने में सक्षम है। ग्लोबल कंपनियां अब 'China-Plus-One' रणनीति अपना रही हैं, जिसके लिए भारत का स्थिर और पूर्वानुमानित मार्केट एक बड़ा आकर्षण बना है।
निवेशकों के लिए संकेत
BRICS जैसे ग्रुप्स के भीतर आम सहमति की कमी यह साफ संकेत देती है कि भविष्य में वैश्विक व्यापार का रुख व्यक्तिगत देशों की नीतियों से तय होगा। निवेशकों को अब दोनों देशों की ट्रेड पॉलिसी, रेगुलेटरी बदलाव और इंफ्रास्ट्रक्चर स्पेंडिंग पर पैनी नजर रखनी होगी, क्योंकि यही तय करेगा कि कौन सा देश अपनी आंतरिक सीमाओं को बेहतर तरीके से पार कर पाता है।
