भारत और Chile के बीच Comprehensive Economic Partnership Agreement (CEPA) को लेकर बातचीत तेज हो गई है। साल 2026 के अंत तक इस डील को फाइनल करने का लक्ष्य है, जिससे फार्मा, इंजीनियरिंग और क्रिटिकल मिनरल्स के व्यापार को बड़ी रफ्तार मिलेगी।
भारत और Chile के बीच अब ट्रेड रिलेशंस एक नए स्तर पर जाने की तैयारी में हैं। हाल ही में सैंटियागो में कॉमर्स सेक्रेटरी राजेश अग्रवाल और चिली की वाइस-मिनिस्टर पाउला एस्टेवेज़ वेनस्टीन के बीच हुई अहम बैठक में इस समझौते को लेकर बड़ा फैसला लिया गया है।\n\n### मिनरल्स और फार्मा पर फोकस\n\nइस डील के पीछे भारत की बड़ी रणनीति है। भारत अपनी इलेक्ट्रिक व्हीकल और एनर्जी सेक्टर की जरूरतों को पूरा करने के लिए Chile से लिथियम और कॉपर जैसे क्रिटिकल मिनरल्स तक सीधी पहुंच बनाना चाहता है। इसका सीधा फायदा उन भारतीय कंपनियों को होगा जो घरेलू मैन्युफैक्चरिंग में इन कच्चे माल पर निर्भर हैं। वहीं दूसरी ओर, Chile के बाजार में भारतीय फार्मा और इंजीनियरिंग उत्पादों के लिए नए रास्ते खुलेंगे, जिससे भारतीय एक्सपोर्टर्स को ग्लोबल कॉम्पिटिशन में मजबूती मिलेगी।\n\n### क्या हैं रिस्क फैक्टर्स?\n\nहालांकि डील का लक्ष्य साल के अंत तक का है, लेकिन ट्रेड नेगोशिएशन की राह आसान नहीं होती। ड्यूटी स्ट्रक्चर, मार्केट एक्सेस और लोकल रेगुलेशंस पर आम सहमति बनाना एक जटिल प्रक्रिया है। साथ ही, भू-राजनीतिक हालात (Geopolitical conditions) और माइनिंग से जुड़े स्थानीय नियम भी सप्लाई चेन में बाधा डाल सकते हैं।\n\nनिवेशकों को अब आने वाले दौर की बातचीत पर नजर रखनी चाहिए कि किन सेक्टरों को ज्यादा टेरिफ रियायतें मिलती हैं। यह समझौता भारतीय कंपनियों के लिए नए बाजार खोजने और कच्चा माल सस्ता करने के लिहाज से काफी अहम साबित हो सकता है।
