भारत की नई Carbon Credit Trading Scheme ने एमिशन (emissions) की कीमत तय कर दी है, लेकिन हैवी इंडस्ट्रीज के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं। ग्लोबल कार्बन कीमतों और घरेलू दरों में भारी अंतर और European Union के सख्त नियमों के चलते स्टील, सीमेंट और पेट्रोकेमिकल कंपनियों के मार्जिन पर दबाव दिख सकता है।
भारत की Carbon Credit Trading Scheme (CCTS) के लागू होने के साथ ही भारी उद्योगों के काम करने के तरीके में बड़ा बदलाव आया है। अब कंपनियों के लिए एमिशन जवाबदेही अनिवार्य हो गई है। हालांकि यह पॉलिसी 'डिकार्बोनाइजेशन' की दिशा में एक कदम है, लेकिन स्टील, सीमेंट और केमिकल जैसे एनर्जी-इंटेंसिव सेक्टर के लिए यह बड़े ऑपरेशनल रिस्क भी लेकर आई है।
प्राइस गैप और एक्सपोर्ट का खतरा
निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कार्बन कीमतों के बीच का अंतर है। भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए European Union का Carbon Border Adjustment Mechanism (CBAM) एक बड़ी चुनौती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत और यूरोप के कार्बन प्राइस में लगभग $70 से $80 प्रति टन का भारी अंतर है। यह गैप उन कंपनियों के लिए सीधा खतरा है जो यूरोप में भारी मात्रा में एक्सपोर्ट करती हैं, क्योंकि एमिशन इंटेंसिटी कम न होने पर उन्हें ऊंचे टैक्स या ट्रेड बैरियर का सामना करना पड़ सकता है।
कैपिटल की जरूरत और पॉलिसी का गैप
नेट-जीरो लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत को 2070 तक ट्रिलियन डॉलर्स के निवेश की जरूरत है। फिलहाल, देश में एक स्टैंडर्ड 'Climate Finance Taxonomy' की कमी है, जिससे बैंकों के लिए ग्रीन प्रोजेक्ट्स को पहचानना और फंड देना मुश्किल हो रहा है। इसके अलावा, अभी डीकार्बोनाइजेशन को प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग का पूरा हिस्सा नहीं बनाया गया है, जिससे कंपनियों को अपने मौजूदा कैश फ्लो पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जो उनके कर्ज के दबाव को बढ़ा सकता है।
कंपनियों का एडॉप्टेशन
अब निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां इन रेगुलेटरी चुनौतियों से कैसे निपटती हैं। केवल एमिशन के आंकड़ों पर ध्यान देने के बजाय, उन कंपनियों पर नजर रखें जो ग्रीन टेक्नोलॉजी और एनर्जी एफिशिएंसी के लिए बड़ा कैपिटल खर्च कर रही हैं। जो कंपनियां रिन्यूएबल एनर्जी को अपने मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस में जल्द अपनाएंगी, वे लॉन्ग टर्म में बेहतर प्रदर्शन करेंगी।
