India Balance of Payments: कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाई चिंता, सरप्लस उम्मीद से कम

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AuthorAditya Rao|Published at:
India Balance of Payments: कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाई चिंता, सरप्लस उम्मीद से कम

भारत का बैलेंस ऑफ पेमेंट्स (BoP) सरप्लस अनुमान से कम रहा है। इसकी मुख्य वजह तेल आयात में **31%** का बड़ा उछाल है, जिसने मजबूत विदेशी निवेश (FDI) के असर को काफी हद तक कम कर दिया है।

तेल का आयात बना बड़ा सिरदर्द

भारत का एक्सटर्नल अकाउंट इस वक्त मजबूत कैपिटल इनफ्लो और बढ़ते ट्रेड डेफिसिट के बीच फंसा हुआ है। सितंबर महीने में ट्रेड डेफिसिट $30.2 बिलियन पर पहुंच गया है। हालांकि देश के मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट में 23% की बढ़त हुई और यह $44 बिलियन रहा, लेकिन तेल के आयात में 31% का भारी इजाफा इस ग्रोथ पर भारी पड़ गया। जानकारों का अनुमान है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें $95 प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो सालाना गुड्स डेफिसिट $388 बिलियन तक जा सकता है, जिससे करंट अकाउंट डेफिसिट जीडीपी का 1.4% यानी करीब $57 बिलियन हो सकता है।

कैपिटल आउटफ्लो और निवेश पर असर

अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच भारत में $76 बिलियन का कुल इनफ्लो हुआ, जो पिछले साल के $12 बिलियन के मुकाबले बेहतर है। लेकिन इसके साथ ही बड़ी निकासी भी हुई है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने $3.7 बिलियन बाजार से निकाले, वहीं एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग (ECB) के जरिए $28.3 बिलियन का आउटफ्लो दर्ज किया गया। इन बड़े रिपेमेंट्स और निकासी ने सरप्लस को सीमित कर दिया है।

निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?

रुपये में उतार-चढ़ाव का सीधा असर कंपनियों के मार्जिन पर पड़ेगा। ऑयल मार्केटिंग, केमिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी इंपोर्ट पर निर्भर कंपनियों की लागत बढ़ सकती है, जबकि आईटी और फार्मा जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर को फायदा हो सकता है। फिलहाल, RBI की करेंसी इंटरवेंशन और ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतों पर निवेशकों की नजरें टिकी रहेंगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.