भारतीय कंपनियां अब दक्षिण-पूर्व एशिया (ASEAN) के साथ सीधे मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी साझेदारी पर जोर दे रही हैं। **$128 बिलियन** के इस ट्रेड कॉरिडोर में अब ट्रांजैक्शनल ट्रेड की जगह लंबी अवधि के स्ट्रैटेजिक गठजोड़ ले रहे हैं, जिस पर निवेशकों की पैनी नजर है।
भारत और ASEAN देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते एक नए दौर में प्रवेश कर रहे हैं। 'नमस्ते एशिया समिट 2026' में उद्योग जगत के दिग्गजों ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि दक्षिण भारतीय कंपनियां अब केवल सामान खरीदने-बेचने तक सीमित नहीं रहना चाहतीं। लक्ष्य अब सप्लाई चेन को गहराई से एकीकृत (Integrated) करने का है।
केवल व्यापार नहीं, अब साझेदारी पर फोकस
पुराने ट्रांजैक्शनल मॉडल को पीछे छोड़ते हुए, कंपनियां अब टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और साझा मैन्युफैक्चरिंग पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। इसका उद्देश्य वैश्विक सप्लाई चेन के झटकों से निपटने के लिए अधिक लचीला प्रोडक्शन नेटवर्क तैयार करना है। इसमें संयुक्त प्रोडक्ट डेवलपमेंट और साझा इंडस्ट्रियल फैसिलिटीज जैसे बड़े कदम शामिल हैं।
साउथ इंडिया बनेगा 'हब'
आंध्र प्रदेश का 'श्री सिटी' (Sri City) इस बदलाव का बड़ा उदाहरण बनकर उभरा है, जहां एशियाई मूल की 65 से अधिक कंपनियां पहले ही काम कर रही हैं। स्थानीय स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग बढ़ने से कंपनियों के इन्वेंट्री मैनेजमेंट और कैपिटल स्पेंडिंग पर असर पड़ सकता है। हालांकि, इसमें शुरुआती निवेश काफी ज्यादा है, लेकिन लंबी अवधि में यह बाहरी निर्भरता को कम करेगा।
पॉलिसी और रेगुलेटरी अपडेट्स
इस दिशा में भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) और KLSICCI के बीच एक औपचारिक साझेदारी हुई है। हालांकि, निवेशकों को ASEAN-India Trade in Goods Agreement (AITIGA) की समीक्षा पर नजर रखनी चाहिए। टैरिफ, नॉन-टैरिफ बैरियर्स और ओरिजिन के नियमों में कोई भी बदलाव बाजार की चाल को प्रभावित कर सकता है। विशेष रूप से MSMEs के लिए मार्केट वोलेटिलिटी और कैपिटल की चुनौतियां बनी रहेंगी, जिन पर भविष्य की रिपोर्टों में स्पष्टता आएगी।
