भारत का AI सेक्टर 2032 तक **$131.31 बिलियन** यानी करीब **₹10 लाख करोड़** का हो जाएगा। इस मिशन को **₹10,372 करोड़** के इंडिया AI मिशन का सपोर्ट मिल रहा है। पर, इस ग्रोथ के लिए बिजली, पानी और रूल्स पर खास ध्यान देना होगा।
AI का इंफ्रास्ट्रक्चर बनेगा बड़ा सवाल
भारत का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सेक्टर तेजी से आगे बढ़ रहा है और उम्मीद है कि 2032 तक यह $131.31 बिलियन का आंकड़ा पार कर जाएगा। इस ग्रोथ को रफ्तार देने के लिए सरकार ₹10,372 करोड़ का 'इंडिया AI मिशन' चला रही है, जिसका मकसद कंप्यूटिंग पावर और रिसर्च को बढ़ावा देना है।
जैसे-जैसे निवेशक इस सेक्टर में पैसा लगा रहे हैं, कहानी सिर्फ सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट से हटकर AI मॉडल्स को चलाने के लिए जरूरी फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की ओर बढ़ रही है।
डेटा सेंटर्स और बिजली की जरूरत
AI के बड़े पैमाने पर विकास के लिए हाइपर-स्केल डेटा सेंटर्स की जरूरत होगी। ये सेंटर्स सामान्य सर्वर फार्म्स से कहीं ज्यादा बिजली खाते हैं और इन्हें लगातार, बिना रुके पावर सप्लाई चाहिए। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर क्लीन एनर्जी के डेडिकेटेड सोर्स नहीं मिले, तो इन सेंटर्स को चलाने में बड़ा रिस्क होगा। साथ ही, कूलिंग सिस्टम के लिए पानी की लगातार सप्लाई भी बहुत जरूरी है। ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर चैलेंजेज को सॉल्व करने वाली कंपनियां, चाहे वो पावर यूटिलिटी हों या डेटा सेंटर डेवलपर्स, AI इन्वेस्टमेंट में अहम भूमिका निभाएंगी।
रेगुलेटरी अनिश्चितता और बड़े फैसले
जहां इंफ्रास्ट्रक्चर एक बड़ी चुनौती है, वहीं रेगुलेटरी क्लेरिटी (नियमों की स्पष्टता) एक बड़ा अड़चन है। दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां भारत में भारी निवेश करने से पहले डेटा ट्रांसफर, AI से बने कंटेंट के कॉपीराइट और AI गवर्नेंस को लेकर साफ नीतियों का इंतजार कर रही हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी फाइनेंस में AI के इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई है, खासकर एल्गोरिथमिक बायस, डेटा प्राइवेसी और सिस्टमैटिक रिस्क जैसे मुद्दों पर।
निवेशकों का भरोसा और आगे क्या?
भारतीय म्यूचुअल फंड्स का टेक्नोलॉजी सेक्टर पर भरोसा बढ़ा है, जिसका एक्सपोजर जुलाई 2026 तक 6.6% तक पहुंच गया है। इससे पता चलता है कि इंस्टीट्यूशनल मनी इस स्पेस में एक्टिव है। हालांकि, समझदार निवेशक 'इंडिया AI मिशन' के असल एग्जीक्यूशन पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। शेयरधारकों के लिए यह देखना जरूरी होगा कि कंपनियां जरूरी पावर इंफ्रास्ट्रक्चर बिना लागत बढ़ने या रेगुलेटरी मुश्किलों के हासिल कर पाती हैं या नहीं।
इसके अलावा, NSE और BSE जैसे स्टॉक एक्सचेंजों में भी AI का इंटीग्रेशन बढ़ रहा है, जिससे साइबर खतरे और हाई-फ्रीक्वेंसी या AI-ड्रिवन ट्रेडिंग में रेगुलेटरी सख्ती का रिस्क पैदा हो सकता है। जैसे-जैसे सेक्टर विकसित हो रहा है, यह देखना बाकी है कि कौन सी कंपनियां पॉलिसीमेकर्स की ओर से स्थिर नियम और खुद की तरफ से AI कंप्यूटिंग की भारी एनर्जी इंटेंसिटी को मैनेज करने की क्षमता के दम पर आगे बढ़ पाएंगी।
