ITAT बेंगलुरु ने एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि इनकम टैक्स पोर्टल पर सेक्शन 148 का नोटिस अपलोड कर देना ही काफी नहीं है। टैक्स विभाग को यह साबित करना होगा कि इसकी जानकारी टैक्सपेयर तक सही ढंग से पहुंची है।
क्या है पूरा मामला?
बेंगलुरु की ITAT बेंच ने स्पष्ट किया है कि डिजिटल सुविधा का मतलब यह नहीं कि कानूनी प्रक्रिया के नियमों को ताक पर रख दिया जाए। हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि केवल इनकम टैक्स ई-फाइलिंग पोर्टल पर नोटिस अपलोड करने को 'वैध सेवा' नहीं माना जा सकता।
क्या था मामला?
यह केस 2015-16 असेसमेंट ईयर के दौरान ₹1.14 करोड़ के अघोषित कैश डिपॉजिट से जुड़ा था। टैक्स विभाग ने नोटिस तो पोर्टल पर जनरेट कर दिया था, लेकिन वह यह साबित नहीं कर पाया कि इसकी सूचना टैक्सपेयर को ईमेल या SMS के जरिए मिली थी। विभाग की इसी ढिलाई के चलते ITAT ने पूरी री-असेसमेंट प्रक्रिया को ही 'अवैध' घोषित कर दिया। कोर्ट ने कैश डिपॉजिट की जांच करने तक की जरूरत नहीं समझी क्योंकि कानूनी प्रक्रिया का पालन ही नहीं हुआ था।
टैक्सपेयर्स के लिए क्यों है यह राहत?
यह फैसला आम जनता के लिए एक मजबूत कवच की तरह काम करेगा। अक्सर विभाग डेडलाइन खत्म होने से ठीक पहले नोटिस जारी कर देता है। अब यदि टैक्स विभाग यह साबित नहीं कर पाता कि नोटिस के साथ प्रॉपर अलर्ट भेजा गया था, तो टैक्सपेयर इस प्रक्रिया को कानूनी रूप से चुनौती दे सकते हैं। डिजिटल फाइलिंग और औपचारिक सूचना (Formal Issuance) के बीच का यह अंतर अब से टैक्स अधिकारियों को और अधिक सतर्क करेगा।
