IMF ने आगाह किया है कि मिडिल ईस्ट में जारी तनाव भारत में महंगाई को बढ़ा सकता है। हालांकि भारत ने क्रूड ऑयल की सप्लाई को डायवर्सिफाई कर लिया है, लेकिन डीजल और जेट फ्यूल जैसी रिफाइंड चीजों के दाम बढ़ने से बिजनेस की लागत पर असर पड़ना तय है।
तेल की बढ़ती कीमतें और इकोनॉमी पर असर
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने मिडिल ईस्ट की भू-राजनीतिक अस्थिरता को भारत की महंगाई दर (Inflation) के लिए एक बड़ा खतरा बताया है। चिंता का विषय अब केवल कच्चा तेल नहीं, बल्कि रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की बढ़ती लागत है। एनर्जी की बढ़ती कीमतें अर्थव्यवस्था पर एक 'हिडन टैक्स' की तरह काम करती हैं, जो लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन सेक्टर को सीधे प्रभावित करती हैं।
RBI और ब्याज दरों का समीकरण
यदि ग्लोबल लेवल पर एनर्जी की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहीं, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए ब्याज दरों (Interest Rates) में कटौती करना मुश्किल हो सकता है। महंगी ब्याज दरें कंपनियों और उपभोक्ताओं के लिए उधार लेना महंगा कर देती हैं, जिससे आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार धीमी होने का डर रहता है।
फिस्कल डेफिसिट और सरकार की चुनौतियां
IMF ने सरकार को सलाह दी है कि वह व्यापक फ्यूल सब्सिडी देने के बजाय केवल जरूरतमंद वर्ग को ही टारगेटेड सपोर्ट दे, ताकि फिस्कल डेफिसिट नियंत्रण में रहे। फिस्कल डेफिसिट बढ़ने से सरकारी बॉन्ड यील्ड (Bond Yields) में बढ़ोतरी हो सकती है, जिसका असर इक्विटी मार्केट्स के वैल्युएशन पर पड़ सकता है क्योंकि निवेशक सुरक्षित रिटर्न की तलाश में रहते हैं।
आगे की राह
IMF ने भारत की 7% की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान बरकरार रखा है, लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में निवेश की सुस्ती और एशियाई बाजारों में बढ़ती बॉन्ड यील्ड जैसे जोखिमों के प्रति सतर्क रहने की सलाह दी है। निवेशकों के लिए अब ग्लोबल क्रूड प्राइस और भारतीय रिटेल इन्फ्लेशन डेटा पर नजर रखना सबसे जरूरी होगा।
