इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) की अक्टूबर 2026 की 'वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक' रिपोर्ट में वैश्विक कॉर्पोरेट टैक्स कटौती की होड़ पर चिंता जताई गई है। इन्वेस्टमेंट खींचने के लिए टैक्स दरें कम करने के इस दौर में अब सरकारों के लिए सरकारी खजाना और रेवेन्यू बचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
IMF ने अपनी हालिया रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि पिछले एक दशक से अधिक समय से दुनिया भर के देश विदेशी कंपनियों को लुभाने के लिए कॉर्पोरेट टैक्स की दरों को घटाने की होड़ में लगे हैं, जिसे 'रेस टू द बॉटम' कहा जा रहा है। अब सरकारें समझ रही हैं कि इस कदम से रेवेन्यू का बड़ा नुकसान हो रहा है।
निवेश और रेवेन्यू पर असर
रिपोर्ट के मुताबिक, FDI पर टैक्स दरों का असर बहुत गहरा है। डेटा बताता है कि वैश्विक औसत की तुलना में किसी देश के कॉर्पोरेट टैक्स में 1% की बढ़ोतरी होने पर, अगले 3 सालों में FDI में 0.5% तक की गिरावट आ सकती है। हालांकि, कर्ज लेकर टैक्स कटौती को बढ़ावा देने से ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स बढ़ सकते हैं, जो अन्य प्रोडक्टिव निवेशों के लिए खतरा बन सकते हैं।
टैक्स रेट से आगे की सोच
अब सरकारें केवल टैक्स रेट कम करने के बजाय टारगेटेड फिस्कल इंसेंटिव्स और मजबूत एंटी-अवॉयडेंस (anti-avoidance) नियमों की ओर बढ़ रही हैं। मल्टीनेशनल कंपनियां टैक्स बचाने के लिए मुनाफा दूसरी जगहों पर शिफ्ट करने में माहिर हो गई हैं, जिससे निपटने के लिए अब सख्त नियम जरूरी हो गए हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था का उदाहरण
IMF ने भारत का जिक्र करते हुए कहा कि 2019 में भारत ने जब कॉर्पोरेट टैक्स दरें कम की थीं, तो साथ में टैक्स छूटों (exemptions) को भी हटाया था। इससे रेवेन्यू का नुकसान सीमित रहा। साथ ही, GST के स्थिर होने से सरकार को टैक्स आय के लिए केवल कॉर्पोरेट टैक्स पर निर्भर नहीं रहना पड़ा।
निवेशकों के लिए जोखिम
इन्वेस्टर्स के लिए यह एक संकेत है कि भविष्य में रेगुलेटरी सख्ती बढ़ सकती है। जो कंपनियां जटिल अंतरराष्ट्रीय स्ट्रक्चर का इस्तेमाल कर मुनाफा शिफ्ट करती हैं, उन्हें अब भारी टैक्स विवाद या अधिक अनुपालन लागत (compliance cost) का सामना करना पड़ सकता है।
