इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को सुझाव दिया है कि वह रुपये को ग्लोबल एनर्जी संकट से निपटने के लिए और अधिक फ्री फ्लोट (float) होने दे। हालांकि, IMF ने चेतावनी भी दी है कि अगर इससे महंगाई बढ़ती है, तो सेंट्रल बैंक को मॉनेटरी पॉलिसी सख्त करने के लिए तैयार रहना होगा।
बाजार को सौंपें कमान
IMF का मानना है कि जब ग्लोबल एनर्जी के दाम बढ़ते हैं, तो रुपया गिरने पर सेंट्रल बैंक का दखल देने के बजाय बाजार को ही इसकी वैल्यू तय करने देनी चाहिए। यह एक तरह के 'शॉक एब्जॉर्बर' (shock absorber) की तरह काम करेगा। भारत अपनी एनर्जी जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है, इसलिए क्रूड ऑयल और नेचुरल गैस के दाम बढ़ने पर विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ जाती है। अब तक RBI फॉरेक्स मार्केट में इंटरवेंशन (intervention) करके रुपये को गिरने से बचाता रहा है, लेकिन IMF का मानना है कि इसे हमेशा रोकना सही नहीं है।
महंगाई का बड़ा रिस्क
IMF ने चेतावनी दी है कि अगर रुपया ज्यादा टूटता है, तो बाहर से आने वाला ईंधन महंगा हो जाएगा, जिसका सीधा असर घरेलू महंगाई पर पड़ेगा। यदि महंगाई बेकाबू होती है, तो RBI को मॉनेटरी पॉलिसी टाइट करनी पड़ सकती है। इसका मतलब है कि भविष्य में इंटरेस्ट रेट्स में बढ़ोत्तरी या सिस्टम में लिक्विडिटी को कम करना।
निवेशकों पर क्या होगा असर?
यह पॉलिसी डिबेट निवेशकों के लिए काफी अहम है क्योंकि इससे अलग-अलग सेक्टरों पर गहरा असर पड़ता है:
- इंपोर्ट-ओरिएंटेड कंपनियां: ऑयल मार्केटिंग फर्म, पेंट निर्माता और इलेक्ट्रॉनिक असेंबलर्स को रुपये की कमजोरी से मार्जिन पर दबाव झेलना पड़ सकता है।
- एक्सपोर्ट सेक्टर: आईटी और फार्मा जैसी कंपनियों को कमजोर रुपये से कमाई में फायदा हो सकता है, लेकिन यह ग्लोबल डिमांड पर निर्भर करेगा।
निवेशक अब RBI के अगले फैसलों, महंगाई के आंकड़ों और करेंसी इंटरवेंशन को लेकर सेंट्रल बैंक के रुख पर पैनी नजर रख रहे हैं।
