IMF ने अमीर देशों को तुरंत बजट डेफिसिट कम करने की सलाह दी है। ग्लोबल कर्ज **2030** तक **100%** GDP के पार जाने की आशंका है, जिससे उभरते बाजारों और भारतीय निवेशकों के लिए भी चिंताएं बढ़ गई हैं।
बैंकॉक में आयोजित IMF-World Bank की सालाना मीटिंग में मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने साफ कर दिया है कि अब केवल इकोनॉमिक ग्रोथ के भरोसे कर्ज के बड़े बोझ को मैनेज नहीं किया जा सकता। IMF ने अब 'फिस्कल कंसोलिडेशन' यानी बजट में कटौती का सख्त रास्ता अपनाने को कहा है ताकि ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम को किसी बड़े संकट से बचाया जा सके।
निवेशकों के लिए जोखिम क्या है?
समस्या तब शुरू होती है जब विकसित अर्थव्यवस्थाएं अपनी कमाई से ज्यादा खर्च करती हैं। भारी उधारी के कारण ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स (Interest Rates) ऊंचे बने रहते हैं। इसका सीधा असर विकासशील देशों पर पड़ता है, जिन्हें ग्लोबल कैपिटल को अपनी ओर खींचने के लिए ज्यादा ब्याज चुकाना पड़ता है। नतीजा यह होता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर और हेल्थकेयर के लिए फंड कम पड़ जाता है।
आंकड़े दे रहे हैं चेतावनी
IMF के मुताबिक, गरीब देशों के लिए कर्ज चुकाने की लागत अब सरकारी रेवेन्यू का 14% तक पहुँच गई है, जो एक दशक पहले महज 6% थी। 2026 में ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ 3.1% और 2027 में 3.4% रहने का अनुमान है, लेकिन IMF ने इसे 'नाजुक' बताया है। अगर AI से जुड़ी उम्मीदें पूरी नहीं हुईं, तो सरकारी कर्ज के साथ मिलकर यह ग्लोबल स्टेबिलिटी के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
भारतीय बाजार पर असर
भारतीय निवेशकों के लिए यह खबर इसलिए अहम है क्योंकि विकसित देशों में बढ़ती ब्याज दरें विदेशी पोर्टफोलियो फ्लो (FPI) को प्रभावित कर सकती हैं। जब ग्लोबल मार्केट में उधारी महंगी होती है, तो निवेशक सतर्क हो जाते हैं, जिससे करेंसी और इक्विटी मार्केट पर दबाव बढ़ सकता है। आने वाले समय में केंद्रीय बैंकों के फैसले, बजट पॉलिसी और ग्लोबल एनर्जी प्राइस पर नजर रखना बहुत जरूरी होगा।
