IMF की चेतावनी: सब्सिडी का बोझ बिगाड़ रहा है सरकारी खजाना, निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorNeha Patil|Published at:
IMF की चेतावनी: सब्सिडी का बोझ बिगाड़ रहा है सरकारी खजाना, निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?

IMF ने चेतावनी दी है कि महंगाई से राहत के लिए दी जाने वाली 'ब्लैंकेट सब्सिडी' बहुत कम असरदार है। सरकारी बजट पर पड़ने वाला यह भारी दबाव भारतीय निवेशकों के लिए चिंता का विषय हो सकता है, क्योंकि सरकार को फिस्कल अनुशासन और राहत के बीच संतुलन बनाना होगा।

अपनी ताजा 'वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक' रिपोर्ट में IMF ने साफ कर दिया है कि उभरती अर्थव्यवस्थाएं महंगाई से निपटने के लिए जो तरीका अपना रही हैं, वह काफी महंगा और नाकाफी है। फूड या फ्यूल पर दी जाने वाली सामान्य सब्सिडी का फायदा उन लोगों तक भी पहुंच रहा है, जिन्हें वास्तव में इसकी जरूरत नहीं है।

आंकड़ों में समझें खेल

IMF की रिपोर्ट के मुताबिक, सब्सिडी का खेल कितना खर्चीला है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कंज्यूमर सब्सिडी पर होने वाला खर्च सीधे कैश ट्रांसफर (Direct Cash Transfer) के मुकाबले 3 से 6 गुना ज्यादा है। वहीं, प्रोड्यूसर सब्सिडी का हाल तो और भी बुरा है, जो 14 से 22 गुना ज्यादा महंगा साबित हो रहा है।

भारत पर क्या होगा असर?

भारत के लिए चुनौती बड़ी है। मौजूदा समय में पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती जैसे कदम जरूर आम आदमी को राहत देते हैं, लेकिन इसका असर सरकारी खजाने पर साफ दिख रहा है। मार्केट जानकारों का अनुमान है कि FY27 में फिस्कल डेफिसिट 4.7% से 4.9% तक जा सकता है, जो सरकार के 4.3% के लक्ष्य से काफी ज्यादा है।

निवेशकों को एक बात समझनी होगी: जब बजट का बड़ा हिस्सा सब्सिडी में चला जाता है, तो इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉन्ग-टर्म ग्रोथ के लिए सरकार के पास पैसा कम बचता है। अगर फिस्कल डेफिसिट इसी तरह ऊपर बना रहा, तो सरकारी उधार लेने की लागत बढ़ सकती है। अब निवेशकों की नजर सरकार के अगले बजट और पॉलिसी अपडेट्स पर है कि क्या सरकार शॉर्ट-टर्म राहत की जगह लॉन्ग-टर्म फिस्कल हेल्थ को तरजीह देती है या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.