अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की नई मुख्य अर्थशास्त्री, सिल्वाना तेनरेरो, ने आगाह किया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में भारी निवेश महंगाई को कम करने के बजाय बढ़ा सकता है। निवेशकों को ध्यान देना चाहिए कि AI हार्डवेयर की अत्यधिक मांग उपभोक्ता कीमतों को ऊंचा रख सकती है, जिससे केंद्रीय बैंकों के लिए ब्याज दरें घटाना मुश्किल हो सकता है।
AI का महंगाई पर असर: IMF की नई थ्योरी
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) में नई इकोनॉमिक एडवाइजर, सिल्वाना तेनरेरो, ने एक चौंकाने वाली चिंता जताई है। उनका मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से उत्पादकता (Productivity) बढ़ने की जो उम्मीदें हैं, वो महंगाई को कम करने के बजाय बढ़ा सकती हैं। 20 अगस्त, 2026 को बैंक ऑफ इंग्लैंड के स्टाफ ब्लॉग पर प्रकाशित एक रिसर्च में यह बात सामने आई है। AI का आर्थिक प्रभाव, उम्मीद से कहीं ज़्यादा जटिल नज़र आ रहा है।
क्यों बढ़ेगी महंगाई? AI खर्च और फायदे का अंतर
सिद्धांत के तौर पर, ज़्यादा उत्पादकता का मतलब है कम संसाधनों में ज़्यादा उत्पादन, जिससे कीमतें कम होनी चाहिए। लेकिन, तेनरेरो और उनके सह-लेखकों, जेनी चान और लुडोविका एम्ब्रोसिनो, का तर्क है कि हकीकत कुछ और है। कंपनियां और आम लोग भविष्य के AI फायदों को देखते हुए आज भारी निवेश कर रहे हैं। खासकर AI इंफ्रास्ट्रक्चर में इस भारी निवेश से मांग (Demand) बढ़ी है, जो मौजूदा सप्लाई (Supply) से कहीं ज़्यादा है।
यह मांग और सप्लाई का अंतर टेक्नोलॉजी सेक्टर में साफ दिख रहा है। डेटा सेंटर और खास हार्डवेयर की जबरदस्त ज़रूरत की वजह से कंप्यूटर मेमोरी और ग्राफ़िक्स चिप्स की मांग में भारी उछाल आया है। नतीजतन, लैपटॉप और स्मार्टफोन जैसे कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स की कीमतें बढ़ गई हैं। निवेशकों के लिए, यह एक जीता-जागता उदाहरण है कि कैसे AI-संचालित निवेश अल्पावधि में महंगाई को कम करने की बजाय बढ़ा सकता है।
सेक्टर का खेल: सर्विस बनाम एक्सपोर्ट
रिसर्च यह भी बताती है कि उत्पादकता के ये फायदे कहां मिल रहे हैं, इसका असर महंगाई पर निर्भर करता है। अगर घरेलू स्तर पर तैयार होने वाली सर्विस (Services) में सुधार होता है, तो इससे महंगाई कम होने की ज़्यादा संभावना है, क्योंकि ज़रूरी सेवाएं सस्ती और ज़्यादा कुशल हो जाएंगी।
लेकिन, एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड (निर्यात-उन्मुख) उद्योगों का मामला अलग है। यदि उत्पादकता का फायदा ऐसे क्षेत्रों में केंद्रित होता है जो सामान निर्यात करते हैं, तो इससे मज़दूरी बढ़ सकती है और घरेलू मांग में भी इज़ाफ़ा हो सकता है। ऐसी स्थिति में, अर्थव्यवस्था में सीमित सेवाओं के पीछे ज़्यादा पैसा भागेगा, जो घरेलू कीमतों को बढ़ाएगा।
मॉनेटरी पॉलिसी के लिए क्या मायने?
निवेशकों के लिए सबसे अहम बात यह है कि ब्याज दरों (Interest Rates) पर इसका क्या असर हो सकता है। केंद्रीय बैंक, जैसे कि RBI और US फेडरल रिजर्व, ब्याज दरों का फैसला महंगाई के आंकड़ों के आधार पर करते हैं। अगर AI में चल रहे निवेश चक्र के कारण उपभोक्ता कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरें अपेक्षा से ज़्यादा समय तक ऊंची रखनी पड़ सकती हैं।
निवेशकों को हार्डवेयर की कीमतों के रुझान और सर्विस सेक्टर के महंगाई के आंकड़ों पर नज़र रखनी चाहिए। यदि AI से जुड़ी मांग, बिना तुरंत उत्पादकता लाभ दिए, सप्लाई चेन पर दबाव बनाती रहती है, तो बाज़ार को भविष्य में रेट कट (Rate Cuts) और कॉर्पोरेट मुनाफे के अनुमानों को समायोजित करने की ज़रूरत पड़ सकती है। टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती लागत के कारण मुनाफे पर भी दबाव आ सकता है।
