International Monetary Fund (IMF) ने भारत के नए GDP कैलकुलेशन मेथड को सही ठहराया है। संस्था ने अगले दो फाइनेंशियल ईयर के लिए **7%** ग्रोथ का अनुमान जताया है और रुपये में आई अस्थिरता को घरेलू कमजोरी के बजाय बाहरी असर बताया है।
GDP आंकड़ों पर IMF का भरोसा
International Monetary Fund (IMF) ने भारत के संशोधित GDP कैलकुलेशन फ्रेमवर्क को आधिकारिक मंजूरी दे दी है। सांख्यिकी मंत्रालय (Ministry of Statistics and Programme Implementation) ने बेस ईयर को 2022-23 में बदलकर देश की आर्थिक स्थिति को मापने का तरीका अपडेट किया है। IMF ने इसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बताया है, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ा है कि भारत का आर्थिक डेटा पारदर्शी और सटीक है।
रुपये की चाल और RBI का हस्तक्षेप
रुपये में हालिया उतार-चढ़ाव पर IMF ने स्पष्ट किया है कि यह घरेलू कमजोरी नहीं, बल्कि ग्लोबल झटकों का नतीजा है। भारत ऊर्जा का बड़ा आयातक है, इसलिए ग्लोबल कमोडिटी कीमतों का असर सीधा पड़ता है। इस दबाव को कम करने के लिए RBI ने स्पॉट मार्केट में हस्तक्षेप किया है और सरकारी तेल कंपनियों के लिए विशेष डॉलर विंडो बनाई है। इसके साथ ही विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव्स (Foreign Exchange Derivatives) पर सख्त नियमों ने भी रुपये को मजबूती दी है।
इकोनॉमी के लिए आउटलुक
IMF का मानना है कि भारत की रफ्तार बरकरार रहेगी। वित्त वर्ष 2026-27 और 2027-28 के लिए 7% की ग्रोथ का अनुमान है, जिसके पीछे मुख्य कारण घरेलू कंज्यूमर डिमांड और सर्विस सेक्टर का शानदार प्रदर्शन है। फिलहाल, भारत का कर्ज का स्तर ऐसा है कि सरकार को तुरंत फिजिकल कंसोलिडेशन (Fiscal Consolidation) की जरूरत नहीं है, जिससे सरकारी खर्च जारी रखने की गुंजाइश बनी रहेगी।
निवेशक क्या ट्रैक करें?
भविष्य में कुछ जोखिम भी बने हुए हैं, जिन पर निवेशकों को नजर रखनी होगी:
- क्लाइमेट चेंज: अनियमित मौसम की वजह से खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ सकते हैं, जिससे महंगाई का खतरा बना रहेगा।
- भू-राजनीतिक तनाव: मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से ऊर्जा की लागत और व्यापार पर असर पड़ सकता है।
निवेशकों को यह देखना होगा कि RBI कैसे बाहरी आर्थिक दबावों के बीच ब्याज दरों और लिक्विडिटी पॉलिसी का बैलेंस बनाए रखता है।
