International Monetary Fund (IMF) ने भारत को सलाह दी है कि वह ऑयल कीमतों में उतार-चढ़ाव के समय रुपये को खुद को एडजस्ट करने दे, बजाय इसके कि Reserve Bank of India लगातार बाजार में दखल दे। यह बदलाव भारत की करेंसी मैनेजमेंट स्ट्रैटेजी को पूरी तरह बदल सकता है।
बाजार पर क्या होगा असर?
वर्तमान में Reserve Bank of India (RBI) 'मैनेज्ड फ्लोट' सिस्टम का पालन करता है, जहाँ जरूरत पड़ने पर फॉरेक्स रिजर्व के जरिए डॉलर की सप्लाई की जाती है ताकि रुपये की चाल को संभाला जा सके। IMF का मानना है कि यह तरीका शॉर्ट टर्म के लिए तो ठीक है, लेकिन लॉन्ग टर्म में अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए बाजार को ही तय करने देना चाहिए कि रुपये की वैल्यू क्या होगी।
कंपनियों और निवेशकों के लिए चुनौती
रुपये की वैल्यू का सीधा असर स्टॉक मार्केट की लिस्टेड कंपनियों पर पड़ता है।
- इंपोर्ट पर निर्भर कंपनियां: ऑयल मार्केटिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स और केमिकल सेक्टर की कंपनियों के लिए रुपया कमजोर होने से कच्चा माल महंगा हो जाता है, जिससे उनके मार्जिन पर दबाव आता है।
- एक्सपोर्टर: IT और फार्मा जैसी कंपनियां रुपये की चाल से अलग तरह से प्रभावित होती हैं, जहाँ उन्हें फायदा या नुकसान हो सकता है।
स्ट्रक्चरल सुधारों पर जोर
IMF ने सरकार के उन हालिया कदमों की तारीफ की है, जिनसे सरकारी डेट में विदेशी निवेश बढ़ा है। उनका तर्क है कि अगर कैपिटल अकाउंट मजबूत होगा, तो रुपया ज्यादा स्वतंत्र रूप से मूव कर पाएगा और अर्थव्यवस्था ग्लोबल अनिश्चितताओं को बेहतर तरीके से झेल सकेगी।
अब निवेशकों की नजरें RBI के अगले फैसलों पर होंगी। अगर केंद्रीय बैंक बाजार में दखल कम करता है, तो निवेशकों को करेंसी में ज्यादा उतार-चढ़ाव के लिए तैयार रहना चाहिए। भविष्य में मुद्रास्फीति (Inflation) के आंकड़े और ग्लोबल ऑयल प्राइस ट्रेंडी रुपये की दिशा तय करने वाले मुख्य फैक्टर बने रहेंगे।
