भारत की ग्रोथ पर 'जेंडर गैप' का साया? ILO-NCAER स्टडी का बड़ा खुलासा

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
भारत की ग्रोथ पर 'जेंडर गैप' का साया? ILO-NCAER स्टडी का बड़ा खुलासा

ILO और NCAER की एक संयुक्त स्टडी से पता चला है कि भारत की गिग इकोनॉमी में महिलाओं की भागीदारी काफी कम है। यह सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन महिलाएं इसमें अपनी जगह नहीं बना पा रही हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि 2029-30 तक 23.5 मिलियन होने वाले वर्कफोर्स का पूरा फायदा उठाने के लिए डिजिटल स्किल्स और सुरक्षा से जुड़ी दिक्कतों को दूर करना ज़रूरी है।

भारत की गिग इकोनॉमी (Gig Economy) तेजी से बढ़ रही है और उम्मीद है कि 2029-30 तक इसमें काम करने वालों की संख्या दोगुनी होकर 23.5 मिलियन हो जाएगी। लेकिन, इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (ILO) और नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की एक नई रिपोर्ट चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। स्टडी बताती है कि इस विस्तार में एक बड़े तबके की कमी है - महिलाएं।

डिलीवरी और राइड-हेलिंग जैसे सेक्टर्स में लाखों नौकरियां पैदा हो रही हैं, लेकिन रिपोर्ट में जेंडर गैप (Gender Gap) पर प्रकाश डाला गया है। यह गैप न केवल महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण में बाधा डाल रहा है, बल्कि देश के व्यापक आर्थिक विकास के लक्ष्यों को भी प्रभावित कर रहा है।

गिग इकोनॉमी में दोगुना होगा वर्कफोर्स

इस अनदेखी के आर्थिक मायने काफी बड़े हैं। मौजूदा अनुमानों के मुताबिक, गिग वर्कफोर्स अगले कुछ सालों में बढ़कर 23.5 मिलियन तक पहुँच जाएगा। इकोनॉमिस्ट्स का कहना है कि अगर भारत महिलाओं की लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन (Labour Force Participation) को 50% तक बढ़ा सके, तो देश की सालाना आर्थिक ग्रोथ में लगभग 1% का इजाफा हो सकता है। ILO और NCAER स्टडी का सुझाव है कि अगर गिग इकोनॉमी को ज़्यादा सुलभ बनाया जाए, तो यह इस बदलाव का एक बड़ा इंजन बन सकती है।

Uber Technologies, Swiggy और Urban Company जैसे प्लेटफॉर्म्स के बढ़ने के बावजूद, रिपोर्ट में पाया गया है कि ऐप-आधारित कामों में महिलाएं काफी कम संख्या में हैं। इसके कई कारण हैं, जैसे सुरक्षा की चिंताएं, आवागमन में दिक्कतें और सामाजिक अपेक्षाएं (जैसे देखभाल की ज़िम्मेदारियां)। ये वजहें अक्सर गिग वर्क के पारंपरिक, हाई-इंटेंसिटी मॉडल को कई महिलाओं के लिए कम उपयुक्त बनाती हैं।

डिजिटल और सुरक्षा का फासला

रिसर्च में फाइनेंशियल एक्सेस (Financial Access) और डिजिटल क्षमता (Digital Capability) के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर बताया गया है। भारत ने बैंकिंग के क्षेत्र में काफी प्रगति की है, और 2024 में महिलाओं के बैंक अकाउंट की संख्या लगभग 89% तक पहुँच गई है, लेकिन यह डिजिटल फाइनेंशियल इन्क्लूजन (Digital Financial Inclusion) में नहीं बदला है। स्टडी बताती है कि भारतीय महिलाओं में से सिर्फ 25.2% ऑनलाइन बैंकिंग ट्रांजैक्शन्स (Online Banking Transactions) करती हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 47.1% है।

यह डिजिटल स्किल की कमी प्लेटफॉर्म-आधारित कामों के लिए एक बड़ी रुकावट है, जिनके लिए स्मार्टफोन ऐप्स, GPS नेविगेशन और डिजिटल पेमेंट्स के इस्तेमाल में सहजता की ज़रूरत होती है।

इसके अलावा, इन प्लेटफॉर्म्स का डिज़ाइन भी ऐसा हो सकता है जो पुरुषों के लिए ज़्यादा अनुकूल पैटर्न को प्राथमिकता देता हो। एनालिस्ट्स का कहना है कि एल्गोरिथम मैनेजमेंट (Algorithmic Management), जो अक्सर स्पीड (Speed) और लंबे, अप्रत्याशित घंटों को प्राथमिकता देता है, वह महिलाओं की विशेष सुरक्षा या लचीलेपन (Flexibility) की ज़रूरतों को ध्यान में नहीं रखता हो। इन्वेस्टर्स (Investors) और स्टेकहोल्डर्स (Stakeholders) इस बात पर करीब से नज़र रख रहे हैं कि ये प्लेटफॉर्म्स किस तरह अपने मॉडल्स को अपनाते हैं - जैसे कि सुरक्षा-पहले वाली सुविधाओं (Safety-First Features) या ज़्यादा लचीली शेड्यूलिंग (Flexible Scheduling) को पेश करके - ताकि इस अप्रयुक्त वर्कफोर्स का लाभ उठाया जा सके।

उन इन्वेस्टर्स के लिए जो इस सेक्टर पर नज़र रख रहे हैं, सबसे बड़ी बात यह है कि गिग इकोनॉमी मॉडल की लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी (Long-term Sustainability) उसकी समावेशिता (Inclusivity) पर निर्भर कर सकती है। भविष्य में यह देखना होगा कि ये प्लेटफॉर्म्स डिजिटल लिटरेसी (Digital Literacy) के गैप, सुरक्षा चिंताओं और गिग वर्क को औपचारिक बनाने व सभी वर्गों के लिए समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए संभावित रेगुलेटरी (Regulatory) बदलावों को कैसे संबोधित करते हैं। जैसे-जैसे यह सेक्टर परिपक्व होगा, इन कंपनियों की जेंडर गैप को पाटने की क्षमता उनके स्केल (Scale) करने और वर्कर्स की एक स्थिर सप्लाई बनाए रखने की क्षमता का एक महत्वपूर्ण कारक बन सकती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.