Centre for Responsible AI (IIT Madras) की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, AI और ऑटोमेशन के चलते एंट्री-लेवल की नौकरियां खत्म होने का खतरा पैदा हो गया है। इससे आईटी, बीपीओ और फाइनेंस सेक्टर में भविष्य के लीडर्स तैयार करने वाला पारंपरिक मॉडल बाधित हो सकता है।
IIT Madras के 'Centre for Responsible AI' की यह रिपोर्ट कॉरपोरेट जगत के लिए एक बड़ी चेतावनी है। रिपोर्ट के अनुसार, रूटीन कामों के ऑटोमेशन से वह 'अप्रेंटिसशिप मॉडल' खतरे में पड़ सकता है, जो दशकों से भारतीय कार्यबल की नींव रहा है। आईटी, बीपीओ और फाइनेंशियल सर्विसेज जैसे सेक्टरों में शुरुआती स्तर के कर्मचारी ही वे लोग होते हैं जो आगे चलकर मिड और सीनियर मैनेजमेंट संभालते हैं।
कंपनियों और निवेशकों के लिए रिस्क
आमतौर पर कंपनियां 'पिरामिड स्टाफिंग स्ट्रक्चर' का पालन करती हैं, जहां जूनियर स्तर पर बड़ी संख्या में युवाओं को काम के जरिए ग्रूम किया जाता है। यदि AI इन शुरुआती कामों को अपने हाथ में ले लेगा, तो भविष्य के लीडर्स तैयार करने की नेचुरल प्रक्रिया ही खत्म हो सकती है। निवेशकों के लिए यह एक दीर्घकालिक ऑपरेशनल रिस्क है।
बढ़ती लागत और मार्जिन पर दबाव
इस संकट से निपटने के लिए कंपनियों को अब अपने ट्रेनिंग, री-स्किलिंग और इंटरनल मोबिलिटी बजट को बढ़ाना होगा। यह अतिरिक्त खर्च आने वाले समय में कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित कर सकता है। अगर कंपनियां समय रहते अपनी रणनीति नहीं बदलतीं, तो अगले दशक में उन्हें अनुभवी मैनेजरों की भारी कमी का सामना करना पड़ सकता है।
रिपोर्ट का सुझाव है कि कंपनियों को अब भूमिकाओं को फिर से डिजाइन करना होगा। केवल ऑटोमेशन पर निर्भर रहने के बजाय, एंट्री-लेवल कर्मचारियों को 'कॉम्प्लेक्स डिसीजन मेकिंग' और 'क्रिटिकल थिंकिंग' जैसे मानवीय कौशल सिखाने पर जोर देना होगा। अब निवेशकों को यह ट्रैक करना होगा कि आईटी और सर्विस सेक्टर की बड़ी कंपनियां अपने HR बजट और रिक्रूटमेंट स्ट्रैटेजी में कैसे बदलाव करती हैं, क्योंकि इसी पर उनकी लंबी अवधि की स्थिरता टिकी है।
