IFGE: इथेनॉल और EV भारत की क्लीन मोबिलिटी के साथी, तेल आयात घटाने में अहम

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AuthorMehul Desai|Published at:
IFGE: इथेनॉल और EV भारत की क्लीन मोबिलिटी के साथी, तेल आयात घटाने में अहम

इंडियन फेडरेशन ऑफ ग्रीन एनर्जी (IFGE) ने साफ कर दिया है कि भारत की क्लीन मोबिलिटी के लिए इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और इथेनॉल-ब्लेंडेड फ्यूल दोनों ही ज़रूरी हैं। देश में मौजूदा 30 करोड़ से ज़्यादा इंटरनल कम्बशन इंजन (ICE) वाली गाड़ियों को देखते हुए, IFGE एक मिली-जुली ऊर्जा रणनीति की वकालत कर रहा है।

इथेनॉल और EV: एक साथ, एक लक्ष्य

IFGE का कहना है कि भारत के क्लीन ट्रांसपोर्टेशन की राह सिर्फ एक टेक्नोलॉजी पर निर्भर नहीं रह सकती। इथेनॉल-ब्लेंडेड फ्यूल और इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) दोनों ही देश को सस्टेनेबल एनर्जी की ओर ले जाने में अहम भूमिका निभाएंगे।

मौजूदा गाड़ियों का क्या करें?

IFGE के मुताबिक, भारत में अभी करीब 30 करोड़ ऐसी गाड़ियां हैं जो पेट्रोल-डीजल पर चलती हैं। इन गाड़ियों को रातों-रात EV से नहीं बदला जा सकता। ऐसे में, E20 (जिसमें 20% इथेनॉल होता है) जैसे इथेनॉल ब्लेंड्स कार्बन उत्सर्जन कम करने और इंपोर्टेड क्रूड ऑयल पर निर्भरता घटाने का एक प्रैक्टिकल तरीका हैं।

माइलेज और इंजन की चिंताएं

E20 फ्यूल के इस्तेमाल से माइलेज पर 2% से 6% तक का असर पड़ने की बात सामने आई है। हालांकि, IFGE का कहना है कि टेस्टिंग में इस फ्यूल से इंजन को कोई बड़ा नुकसान होने की बात सामने नहीं आई है। जो गाड़ियां 2008 से पहले बनी हैं, उन्हें थोड़े बदलाव की ज़रूरत पड़ सकती है, लेकिन नई गाड़ियां आसानी से इन ब्लेंड्स को सपोर्ट कर रही हैं।

इथेनॉल प्रोग्राम का आर्थिक फायदा

पर्यावरण के साथ-साथ, इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम देश की इकोनॉमी के लिए भी बड़ा बूस्टर साबित हो रहा है। साल 2014-15 से अब तक इस प्रोग्राम की मदद से ₹1.97 लाख करोड़ से ज़्यादा का विदेशी मुद्रा भंडार बचाया जा चुका है। इसने लगभग 316 लाख मीट्रिक टन क्रूड ऑयल की जगह ली है, जो भारत की एनर्जी सिक्योरिटी के लिए एक बड़ा कदम है।

निवेशकों के लिए क्या है खास?

मार्केट के लिए यह 'मल्टी-टेक' अप्रोच एक बड़ा डेवलपमेंट है। इसका मतलब है कि इंफ्रास्ट्रक्चर में सिर्फ EV चार्जिंग स्टेशन ही नहीं, बल्कि फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल टेक्नोलॉजी, E85 फ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और सेकंड-जेनरेशन इथेनॉल प्रोडक्शन में भी निवेश की ज़रूरत पड़ेगी।

यह रणनीति कितनी कामयाब होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि ऑटोमोबाइल कंपनियां कितनी जल्दी फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल लॉन्च करती हैं और सरकार इथेनॉल सप्लाई चेन को कितना बेहतर मैनेज करती है। निवेशकों को फ्यूल ब्लेंडिंग टारगेट, डोमेस्टिक ऑटोमेकर्स द्वारा फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों को अपनाने की दर और ग्रीन एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की ताज़ा खबरों पर नज़र रखनी चाहिए।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.