ICRIER की नई रिपोर्ट में इथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर फ्लेक्सिबल लक्ष्य तय करने का सुझाव दिया गया है। सप्लाई की कमी होने पर इसे 20% (E20) से घटाकर 15% (E15) करने की बात कही गई है, ताकि बढ़ती फूड महंगाई पर लगाम लगाई जा सके।
खाद्य सुरक्षा बनाम ऊर्जा लक्ष्य
Indian Council for Research on International Economic Relations (ICRIER) की एक नई रिपोर्ट ने भारत की इथेनॉल ब्लेंडिंग रणनीति पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) का लक्ष्य लंबा सफर तय करने के लिए ठीक है, लेकिन इसे थोड़ा लचीला (Flexible) होना चाहिए। जब भी देश में खाद्य पदार्थों की कमी हो या महंगाई बढ़े, तो ब्लेंडिंग टारगेट को 15% (E15) तक लाने की छूट होनी चाहिए।
क्यों बढ़ रहा है यह संकट?
बीते 6 सालों में भारत में इथेनॉल की मांग 38% की सालाना दर से बढ़ी है। समस्या यह है कि इसे बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल जैसे गन्ना, चावल और मक्का का उत्पादन उतनी तेजी से नहीं बढ़ा है। नतीजतन, इसका सीधा असर खाने-पीने की चीजों पर दिख रहा है। रिटेल मार्केट में चीनी की कीमतें ₹45 प्रति किलो से उछलकर ₹65 प्रति किलो के स्तर तक पहुंच गई हैं।
निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?
शुगर कंपनियों के लिए यह एक बड़े नीतिगत जोखिम (Policy Risk) की तरह है। कई कंपनियों ने सरकारी E20 मैंडेट को पूरा करने के लिए अपनी डिस्टिलरी क्षमता में भारी निवेश किया है। अगर सरकार ब्लेंडिंग टारगेट घटाती है, तो इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले गन्ने और अनाज की खपत कम हो जाएगी। इससे कंपनियों के मार्जिन और डिस्टिलरी से होने वाली कमाई पर सीधा असर पड़ सकता है।
भविष्य की रणनीति
ICRIER ने सुझाव दिया है कि चावल और चीनी के बजाय अब सरकार को मक्का (Maize) के इस्तेमाल पर ज्यादा जोर देना चाहिए। साथ ही, घरेलू शॉर्टेज के समय चीनी और इथेनॉल के इंपोर्ट को एक सुरक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अब बाजार की नजर इस बात पर है कि सरकार इन सिफारिशों को मानती है या अपने मौजूदा सख्त लक्ष्यों पर कायम रहती है।
