ICMR-NIN ने खाने के तेल को लेकर नई डाइटरी गाइडलाइन्स जारी की हैं। अब FMCG कंपनियां हेल्थ और न्यूट्रिशन पर फोकस बढ़ा सकती हैं, जिससे मार्केट में बदलाव की उम्मीद है।
न्यूट्रिशन पर फोकस, बदलती रणनीति
हाल ही में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन (NIN) ने खाने के तेल को लेकर जो गाइडलाइन्स जारी की हैं, वे भारतीय FMCG और एग्रो-प्रोसेसिंग सेक्टर के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हो सकती हैं। अब तक कंपनियां तेल के वॉल्यूम और प्राइसिंग पर ज्यादा ध्यान देती थीं, लेकिन मेडिकल एक्सपर्ट्स अब तेल की क्वालिटी और उसमें मौजूद पोषक तत्वों पर जोर दे रहे हैं।
कंपनियों के लिए क्या हैं चुनौतियां?
अब बाजार में 'बायो-एक्टिव' कंपाउंड्स जैसे टोकोट्रिएनोल्स (tocotrienols), लिगनेन्स (lignans) और ओरिजेनॉल (oryzanol) की मांग बढ़ने वाली है। कंपनियों को अपनी R&D और रिफाइनिंग टेक्नोलॉजी में भारी निवेश करना होगा। सवाल यह है कि क्या कंपनियां इन बढ़े हुए खर्चों को प्रीमियम प्रोडक्ट्स के जरिए ग्राहकों पर डालेंगी या फिर अपने मार्जिन को मैनेज करने के लिए खुद अब्जॉर्ब करेंगी?
नेशनल मिशन का रोल
सरकार का 'नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स – ऑयल पाम' अब केवल आयात कम करने का जरिया नहीं, बल्कि न्यूट्रिशनल सिक्योरिटी का भी एक अहम हिस्सा बन गया है। अगर घरेलू उत्पादन बढ़ता है, तो कंपनियों को इंटरनेशनल कमोडिटी प्राइस की वोलेटिलिटी से काफी राहत मिल सकती है।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
आने वाले समय में उन कंपनियों पर नजर रखें जो अपने पोर्टफोलियो को जल्दी 'हेल्थ-फोकस्ड' और 'फोर्टिफाइड' ऑयल्स की ओर शिफ्ट कर रही हैं। साथ ही, सेफ्टी रेगुलेशंस को लेकर भी सख्ती बढ़ सकती है, इसलिए कंपनियों का कंप्लायंस रिकॉर्ड देखना भी जरूरी होगा।
