HSBC Global Research ने RBI को सुझाव दिया है कि वह अपनी अक्टूबर की बैठक में Repo Rate को **25 बेसिस पॉइंट्स** तक बढ़ाए। साथ ही, बैंकिंग सिस्टम से एक्स्ट्रा लिक्विडिटी को कम करने की भी सलाह दी गई है, ताकि बढ़ती महंगाई पर लगाम लगाई जा सके।
दोतरफा रणनीति की जरूरत
HSBC का मानना है कि RBI को मौजूदा मैक्रो-इकोनॉमिक चुनौतियों से निपटने के लिए दोहरे स्तर पर काम करना होगा। इसके तहत 25 बेसिस पॉइंट्स की रेट हाइक के साथ-साथ सिस्टम से अतिरिक्त नकदी (Liquidity) को खींचना जरूरी है। फिलहाल, बैंकिंग सिस्टम में लगभग ₹15 लाख करोड़ की सरप्लस लिक्विडिटी मौजूद है, जो कुल डिपॉजिट का करीब 5% है।
HSBC का कहना है कि सिर्फ वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो जैसे तरीके काफी नहीं हैं। इसे मजबूती से कंट्रोल करने के लिए सिस्टम से ₹5 से 6 लाख करोड़ की लिक्विडिटी को स्थायी रूप से कम करना चाहिए।
महंगाई का दबाव
महंगाई के मोर्चे पर चिंताएं बढ़ रही हैं। रिटेल इन्फ्लेशन जहां 5.5% के आसपास है, वहीं होलसेल इन्फ्लेशन 10% के करीब पहुंच गई है। इसी को देखते हुए HSBC ने दिसंबर तक कुल दो बार 25-25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया है, जिससे रेपो रेट 5.75% तक पहुंच सकता है। यह कदम अमेरिकी फेडरल रिजर्व के रुख और ग्लोबल एनर्जी प्राइसेस के बीच करेंसी को स्थिर रखने के लिए भी अहम है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
अगर RBI दरों में बढ़ोतरी करता है, तो बैंकों के लिए मार्जिन तो बेहतर हो सकते हैं, लेकिन आम जनता के लिए लोन महंगे हो जाएंगे।
- डेब्ट फंड: ब्याज दरें बढ़ने से मौजूदा बॉन्ड की कीमतों में गिरावट आती है, जिसका सीधा असर शॉर्ट-टर्म रिटर्न्स पर पड़ेगा।
- इक्विटी मार्केट: सिस्टम से लिक्विडिटी का निकलना स्टॉक मार्केट के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है, क्योंकि अब तक यह नकदी ही बाजार की तेजी को सपोर्ट कर रही थी।
निवेशकों को अब RBI की आने वाली कमेंट्री और महंगाई के डेटा पर पैनी नजर रखनी होगी क्योंकि यही भविष्य की चाल तय करेंगे।
