Iran और US-Israel के बीच बढ़ते सैन्य टकराव को रोकने के लिए खाड़ी देश कूटनीतिक कोशिशें तेज कर रहे हैं। 3 नवंबर को होने वाले US मिड-टर्म इलेक्शन से पहले इस अस्थिरता ने ग्लोबल मार्केट और एनर्जी सेक्टर की चिंता बढ़ा दी है।
2 नवंबर 2026 तक की स्थिति को देखें तो Gulf Cooperation Council (GCC) के देश भारी अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं। 3 नवंबर को होने वाले US मिड-टर्म इलेक्शन से ठीक पहले, खाड़ी देशों के डिप्लोमैट्स इस कोशिश में जुटे हैं कि किसी तरह Iran और US-Israel के बीच होने वाले संभावित सैन्य टकराव को टाल दिया जाए।
इकोनॉमी पर गहरा असर
इस तनाव का आर्थिक असर पहले से ही दिखने लगा है। IMF की रिपोर्ट्स के मुताबिक, सऊदी अरब की इकोनॉमी में इस साल 3.3% की गिरावट का अनुमान है। इस गिरावट के पीछे रक्षा बजट में भारी बढ़ोतरी, इंफ्रास्ट्रक्चर की मरम्मत और क्षेत्र में चल रहे संघर्ष का आर्थिक दबाव मुख्य वजह है। कुवैत और कतर जैसे देश भी इसी तरह के वित्तीय दबाव का सामना कर रहे हैं।
भारत के लिए चुनौती
ग्लोबल इकोनॉमी और भारत के नजरिए से 'Strait of Hormuz' की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है। यदि इस रास्ते पर किसी तरह की सैन्य हलचल होती है, तो तेल और गैस की सप्लाई बाधित हो सकती है। इसके सीधे परिणाम के तौर पर सप्लाई चेन महंगी होगी और एनर्जी की कीमतों में उछाल आएगा, जिसका असर भारत में महंगाई और कॉर्पोरेट मार्जिन पर पड़ना तय है।
भारतीय निवेशकों को सावधान रहने की जरूरत है। तेल मार्केटिंग कंपनियों, शिपिंग और लॉजिस्टिक सेक्टर का Gulf क्षेत्र से बड़ा एक्सपोजर है। इसके अलावा, ग्लोबल मार्केट में जोखिम बढ़ने पर भारतीय इंडेक्स पर भी दबाव देखा जा सकता है। अब सभी की निगाहें US चुनाव के नतीजों और उसके बाद होने वाली कूटनीतिक चर्चाओं पर टिकी हैं।
