GST Revenue: गुजरात और कर्नाटक ने मारी बाजी! इंपोर्ट टैक्स से खजाना भरा, पर रिफंड ने बढ़ाई चिंता

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorAditi Chauhan|Published at:
GST Revenue: गुजरात और कर्नाटक ने मारी बाजी! इंपोर्ट टैक्स से खजाना भरा, पर रिफंड ने बढ़ाई चिंता

GST रेवेन्यू ग्रोथ में गुजरात और कर्नाटक ने बाजी मार ली है। नेशनल एवरेज को पीछे छोड़ते हुए इन राज्यों ने शानदार आंकड़े पेश किए हैं, लेकिन बढ़ती इंपोर्ट ड्यूटी के बावजूद टैक्स रिफंड का भारी बोझ सरकारी खजाने की नेट ग्रोथ पर असर डाल रहा है।

अगस्त 2026 के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, गुजरात और कर्नाटक ने बाकी राज्यों को पीछे छोड़ दिया है। गुजरात में GST कलेक्शन में सालाना आधार पर 28% का जोरदार उछाल देखा गया है, जो नेशनल एवरेज 14.8% से कहीं ज्यादा है। यह अंतर साफ दिखाता है कि GST 2.0 टैक्स रेजीम के तहत 5% और 18% के नए स्लैब का असर अलग-अलग राज्यों की अर्थव्यवस्था पर कैसे पड़ रहा है।

इंपोर्ट पर निर्भरता और असली तस्वीर

मौजूदा डेटा में एक अहम ट्रेंड यह है कि हेडलाइन ग्रोथ के पीछे इंपोर्ट-आधारित GST का बड़ा हाथ है। नेशनल डेटा के अनुसार, इंपोर्ट-आधारित GST कलेक्शन में 29% का इजाफा हुआ है, जबकि डोमेस्टिक ट्रांजैक्शंस की ग्रोथ महज 9.3% रही। इससे पता चलता है कि गुजरात जैसे राज्य, जो इंटरनेशनल ट्रेड का बड़ा गेटवे हैं, वहां रेवेन्यू की चमक पूरी तरह से घरेलू खपत से नहीं, बल्कि पोर्ट एक्टिविटी और ग्लोबल कमोडिटी मूवमेंट से आ रही है।

टैक्स रिफंड का खेल

भले ही ग्रॉस कलेक्शन के आंकड़े मजबूत लग रहे हों, लेकिन अंदरूनी कहानी थोड़ी पेचीदा है। इस दौरान GST टैक्स रिफंड में 68% की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिसने नेट रेवेन्यू ग्रोथ को सुस्त कर दिया है। इसी कारण ग्रॉस कलेक्शन डबल डिजिट में होने के बावजूद नेट GST कलेक्शन ग्रोथ घटकर केवल 8.3% पर सिमट गई है। निवेशकों और पॉलिसी मेकर्स के लिए यह गैप सबसे बड़ा चिंता का विषय है, क्योंकि इसका सीधा असर राज्य के कैपिटल एक्सपेंडिचर और वेलफेयर प्रोग्राम्स पर पड़ता है।

आर्थिक बदलाव और भविष्य के जोखिम

राज्यों के प्रदर्शन में यह अंतर उनकी आर्थिक मजबूती को दर्शाता है। कर्नाटक का प्रदर्शन वहां के बी2बी (B2B) आईटी सर्विसेज सेक्टर के कारण स्टेबल बना हुआ है। वहीं, गुजरात जैसे मैन्युफैक्चरिंग हब के लिए चुनौतियां ज्यादा हैं। भविष्य में, ग्लोबल ट्रेड में अस्थिरता और कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव सीधे तौर पर इन राज्यों के रेवेन्यू पर असर डाल सकते हैं। अगर रिफंड्स का आंकड़ा इसी तरह 68% की रफ्तार से बढ़ता रहा, तो सरकारी खजाने पर दबाव और बढ़ेगा, जिसे मार्केट पार्टिसिपेंट्स बारीकी से ट्रैक कर रहे हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.