गुजरात में मानसून का सीजन **10%** की बारिश की कमी के साथ खत्म हुआ है। कच्छ और सौराष्ट्र जैसे इलाकों में हालात चिंताजनक हैं, जहाँ देवभूमि द्वारका जैसे जिलों में **80%** तक बारिश कम हुई है। यह स्थिति खरीफ फसलों की पैदावार और ग्रामीण खपत (Rural Consumption) पर सीधा असर डाल सकती है।
मानसून के विदा होने के साथ ही गुजरात के कृषि-प्रधान ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर आर्थिक अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। इंडिया मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट (IMD) के अनुसार, राज्य में 597.4 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो लॉन्ग-टर्म एवरेज 663.9 मिमी से काफी कम है। इस सूखे का प्रभाव समान नहीं है; देवभूमि द्वारका में बारिश में 80% की गिरावट देखी गई है, जबकि पोरबंदर, जामनगर, कच्छ और गिर सोमनाथ जैसे जिलों में 33% से 67% तक की भारी कमी दर्ज की गई है।\n\nयह मौसमी असंतुलन सीधे तौर पर एग्री-सेक्टर को प्रभावित कर रहा है। कम बारिश का मतलब है खरीफ फसलों की पैदावार में कमी, जिससे किसानों की इनकम पर सीधा असर पड़ेगा। इसका असर लिस्टेड एग्री-इनपुट कंपनियों (जैसे खाद, कीटनाशक और बीज बनाने वाली कंपनियां) पर दिख सकता है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में इन उत्पादों की मांग में सुस्ती आ सकती है। जब फसल की पैदावार अनिश्चित होती है, तो किसान गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करते हैं, जो इन कंपनियों के रेवेन्यू ग्रोथ को धीमा कर सकता है।\n\nग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला यह दबाव एफएमसीजी (FMCG), टू-व्हीलर्स और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर तक भी पहुंच सकता है। ग्रामीण उपभोक्ता अपनी खर्च करने की प्राथमिकता बदल सकते हैं, जिसका असर फाइनेंशियल ईयर की दूसरी छमाही में इन कंपनियों के मार्जिन्स पर दिख सकता है। इसके अलावा, चारे की कमी से डेयरी उत्पादकों की लागत बढ़ने का भी जोखिम है।\n\nनिवेशकों की नजर अब रबी सीजन की बुवाई और जलाशयों के जल स्तर पर होनी चाहिए। सरकार द्वारा सिंचाई के लिए पानी के आवंटन और एग्रो-केमिकल कंपनियों की ओर से आने वाले डिमांड कमेंट्री पर भी नजर रखना जरूरी है, जो आने वाले तिमाही नतीजों में अहम भूमिका निभाएंगे।
