गुजरात के तेजी से बढ़ते आर्थिक आंकड़ों के बीच एक चौंकाने वाला डेटा सामने आया है। राज्य में प्रति व्यक्ति आय **₹3 लाख** के पार होने के बावजूद, सरकारी फूड सिक्योरिटी स्कीम से जुड़ने वाले परिवारों की संख्या **FY26** तक तीन गुना बढ़कर **9.21 लाख** हो गई है।
गुजरात, जिसे देश के सबसे संपन्न राज्यों में गिना जाता है, इन दिनों एक 'वेलफेयर पैराडॉक्स' (welfare paradox) का सामना कर रहा है। एक तरफ राज्य की प्रति व्यक्ति आय ₹3 लाख को पार कर गई है, तो दूसरी तरफ सरकारी फूड सिक्योरिटी प्रोग्राम पर निर्भर परिवारों की संख्या में रिकॉर्ड बढ़ोतरी देखी गई है।
वेलफेयर पर बढ़ती निर्भरता
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राज्य में राशन कार्ड धारक परिवारों की संख्या FY23 में 3.06 लाख थी, जो FY26 के अंत तक तीन गुना बढ़कर 9.21 लाख पर पहुंच गई है। इसका सीधा असर लगभग 39.65 लाख लोगों पर पड़ रहा है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह विकास के लाभों के वितरण पर सवालिया निशान लगाता है।
सब्सिडी का गणित और अनाज में बदलाव
सब्सिडी के खर्च पर नजर डालें, तो FY23-24 में यह ₹67.62 करोड़ था, जो FY24-25 में बढ़कर ₹76.66 करोड़ हो गया और FY25-26 में यह ₹70.01 करोड़ पर स्थिर रहा। अनाज वितरण के पैटर्न में भी बड़ा बदलाव आया है। अब गेहूं की तुलना में चावल और मोटे अनाज (Coarse Grains) की मांग बढ़ी है। FY26 में कुल वितरण में 8.76 लाख टन गेहूं, 10.45 लाख टन चावल और 0.88 लाख टन मोटे अनाज शामिल रहे।
आर्थिक स्थिरता के लिए चुनौती
बढ़ती निर्भरता और सरकारी खजाने पर बढ़ते दबाव को देखते हुए अब यह देखना अहम होगा कि राज्य सरकार आने वाले समय में वेलफेयर स्पेंडिंग और कैपिटल एक्सपेंडिचर के बीच तालमेल कैसे बैठाती है। क्या यह सिर्फ बेहतर एडमिनिस्ट्रेटिव आउटरीच है, या आम जनता की आय में कमी का संकेत? यह निवेशकों और नीति निर्धारकों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
