CAG की ऑडिट रिपोर्ट में Green India Mission को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। कंपनी द्वारा तय **1.4 मिलियन** हेक्टेयर लक्ष्य के मुकाबले केवल **0.03 मिलियन** हेक्टेयर पर ही काम हो पाया है। यह रिपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर, माइनिंग और सीमेंट सेक्टर की कंपनियों के लिए नई मुसीबत खड़ी कर सकती है।
इंडस्ट्रियल क्लीयरेंस पर असर
भारत में कई इंफ्रास्ट्रक्चर, माइनिंग और सीमेंट प्रोजेक्ट्स को एनवायरमेंटल क्लीयरेंस पाने के लिए 'कंपनसेटरी अफॉरेस्टेशन' (Compensatory Afforestation) का सहारा लेना पड़ता है। यानी, अगर किसी कंपनी ने प्रोजेक्ट के लिए जंगल काटा, तो उसे कहीं और पेड़ लगाने होते हैं। CAG की रिपोर्ट ने इस मौजूदा प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। अगर सरकार अब नियमों को और सख्त करती है और केवल पेड़ लगाने के बजाय 'इकोलॉजिकल रेस्टोरेशन' पर जोर देती है, तो कंपनियों के लिए कंप्लायंस कॉस्ट (Compliance Cost) काफी बढ़ सकती है।
ESG और कार्बन क्रेडिट का जोखिम
भारत ने 2035 तक 3.5 से 4 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर कार्बन सिंक बनाने का लक्ष्य रखा है। ऑडिट के मुताबिक, मौजूदा रणनीति इस लक्ष्य को पूरा करने में नाकाफी है। इसका सीधा असर कंपनियों की ESG रेटिंग और कार्बन क्रेडिट अकाउंटिंग पर पड़ सकता है। अब कंपनियों को अपने बिजनेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्ट (BRSR) में इन मानकों का और बारीकी से पालन करना होगा।
आगे का रास्ता
आने वाले महीनों में निवेशकों को पर्यावरण मंत्रालय (Ministry of Environment, Forest and Climate Change) के अगले कदमों पर नजर रखनी चाहिए। अगर सरकार नई गाइडलाइंस लाती है, तो लैंड-हेवी इंडस्ट्रीज के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव देखा जा सकता है।
