केंद्रीय वाणिज्य मंत्री Piyush Goyal ने यूरोपीय संघ (EU) के नए कार्बन टैक्स (CBAM) को ग्लोबल इकोनॉमी के लिए बड़ा खतरा बताया है। इस फैसले से स्टील और एल्युमीनियम जैसे प्रोडक्ट्स के एक्सपोर्ट पर बड़ा असर पड़ सकता है, जिससे भारतीय मैन्युफैक्चरर्स के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं।
केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में यूरोपीय संघ के 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) की तीखी आलोचना की है। मंत्री का मानना है कि स्टील, एल्युमीनियम और सीमेंट जैसे प्रोडक्ट्स पर लगाया जाने वाला यह कार्बन टैक्स सस्टेनेबल ग्रोथ के बजाय व्यापार में बाधाएं खड़ी कर रहा है।
भारतीय एक्सपोर्टर्स पर असर
भारतीय मेटल और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के निवेशकों के लिए यह एक बड़ा चिंता का विषय है। CBAM के तहत, यूरोपीय बाजार में प्रवेश करने वाले प्रोडक्ट्स के कार्बन फुटप्रिंट के आधार पर टैक्स वसूला जाएगा। चूँकि भारतीय कंपनियां अभी भी काफी हद तक एनर्जी-इंटेंसिव प्रोसेस का इस्तेमाल कर रही हैं, इसलिए इन नए नियमों को पूरा करने के लिए कंपनियों को भारी निवेश करना पड़ सकता है। यदि कंपनियां खुद को ग्रीन एनर्जी की तरफ नहीं ले जाती हैं, तो एक्सपोर्ट कॉस्ट बढ़ सकती है, जो ग्लोबल मार्केट में उनकी प्राइस कॉम्पिटिटिवनेस को कम कर देगी।
रेगुलेटरी बोझ और महंगाई
मंत्री गोयल ने यह भी तर्क दिया कि यूरोप के सख्त नियम न केवल ट्रेड को नुकसान पहुंचा रहे हैं, बल्कि वहां की अपनी इंडस्ट्रीज पर भी भारी पड़ रहे हैं। उन्होंने जर्मनी के ऑटोमोटिव सेक्टर का उदाहरण देते हुए कहा कि इन नियमों से इनपुट कॉस्ट बढ़ रही है, जिससे महंगाई को बढ़ावा मिल रहा है और वहां की कंपनियां ग्लोबल लेवल पर पिछड़ रही हैं।
भारत का रुख और भविष्य की रणनीति
भारत का मानना है कि ग्रीन एनर्जी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के बावजूद, विकसित देशों को उभरती अर्थव्यवस्थाओं की जिम्मेदारियों को समझना चाहिए। भारत दुनिया की 17% जनसंख्या का समर्थन करता है, जबकि ग्लोबल कार्बन उत्सर्जन में इसका योगदान केवल 3.5% है। सरकार अब सिंगापुर जैसे देशों के साथ नए और खुले ट्रेड चैनल्स पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
आने वाले समय में वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (WTO) के स्तर पर होने वाली बातचीत पर नजर रखना जरूरी है। साथ ही, यह देखना होगा कि बड़ी भारतीय कंपनियां कितनी जल्दी लो-कार्बन प्रोडक्शन प्रोसेस अपनाती हैं और क्या वे बढ़ी हुई लागत का बोझ खरीदारों पर डाल सकती हैं।
