केंद्रीय वाणिज्य मंत्री Piyush Goyal ने विकसित देशों पर क्लाइमेट फाइनेंस के वादों से मुकरने का आरोप लगाया है। साथ ही, उन्होंने European Union के 'Carbon Border Adjustment Mechanism' (CBAM) को भारतीय निर्यातकों के लिए एक बड़ी व्यापारिक बाधा करार दिया है।
वित्त की कमी और विकसित देशों का रवैया
बर्लिन ग्लोबल डायलॉग (Berlin Global Dialogue) में केंद्रीय मंत्री Piyush Goyal ने विकसित देशों की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। वर्षों से यह वादा किया जा रहा था कि विकासशील देशों को हर साल $100 बिलियन की क्लाइमेट फाइनेंसिंग दी जाएगी। हालांकि OECD का कहना है कि यह लक्ष्य 2022 में पूरा कर लिया गया, लेकिन मंत्री ने इस मदद की गुणवत्ता और समयबद्धता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। उनका मानना है कि कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अभी भी उस ग्रांट-आधारित सहायता की कमी है, जो एक सुचारू 'एनर्जी ट्रांजिशन' के लिए जरूरी है।
भारतीय निर्यातकों के लिए CBAM का खतरा
वित्त के अलावा, यूरोपीय संघ के 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) ने चिंता बढ़ा दी है। यह नियम स्टील, एल्युमिनियम और सीमेंट जैसे कार्बन-प्रधान उत्पादों पर टैक्स लगाता है। अब भारतीय कंपनियों को यूरोपीय बाजार में अपनी जगह बनाए रखने के लिए सख्त कार्बन रिपोर्टिंग मानकों का पालन करना होगा। यदि कंपनियां जल्दी 'ग्रीन प्रोडक्शन' की ओर नहीं बढ़ती हैं, तो यह सीधे तौर पर उनके प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित कर सकता है।
निवेशकों के लिए बड़ी सीख
निवेशकों को अब कंपनियों के 'कैपिटल एक्सपेंडिचर' (Capex) पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि क्लीनर टेक्नोलॉजी की ओर शिफ्ट होने के लिए कंपनियों को बड़े निवेश की जरूरत होगी। जो कंपनियां इन वैश्विक नियमों के बीच भी अपनी लागत प्रतिस्पर्धा (Cost Advantage) को बनाए रखेंगी, वही लंबी अवधि में बेहतर प्रदर्शन करेंगी। आगामी समय में इन व्यापारिक बाधाओं पर होने वाली कूटनीतिक चर्चा और कंपनियों की अनुकूलन क्षमता ही सेक्टर की भविष्य की दिशा तय करेगी।
