अब एयरपोर्ट चलाने वाली कंपनियां भी एयरलाइंस खरीद पाएंगी। सरकार ने साफ कर दिया है कि ऐसी किसी भी चीज़ पर कोई राष्ट्रीय नीति की रोक नहीं है। हालांकि, कुछ पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) कॉन्ट्रैक्ट्स में अभी भी ऐसी रोक लगी हो सकती है। एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) ऐसी किसी रोक को हटाने की मांग पर विचार कर रही है।
क्या है पूरा मामला?
नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने राज्यसभा में साफ किया है कि भारत में ऐसी कोई राष्ट्रव्यापी नीति नहीं है जो एयरपोर्ट चलाने वाली कंपनियों को एयरलाइंस में हिस्सेदारी रखने या उन्हें चलाने से रोके।
कॉन्ट्रैक्ट्स का पेंच
हालांकि, सच्चाई यह है कि कई एयरपोर्ट ऑपरेटर्स के पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) वाले कॉन्ट्रैक्ट्स में खास शर्तें होती हैं। इन शर्तों के तहत, एयरपोर्ट ऑपरेटर्स, उनकी ग्रुप कंपनियां या उनसे जुड़े लोग एयरलाइंस के मालिक नहीं बन सकते। ऐसा संभावित हितों के टकराव (Conflict of Interest) को रोकने के लिए किया जाता है।
AAI की मंजूरी का इंतजार
अगर कोई एयरपोर्ट ऑपरेटर एयरलाइन बिजनेस में आना चाहता है, तो उसके लिए सबसे बड़ी रुकावट सरकारी नीति नहीं, बल्कि मौजूदा कॉन्ट्रैक्ट की शर्तें हैं। एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) ने पुष्टि की है कि उन्हें इन कॉन्ट्रैक्ट्स की शर्तों में ढील देने के लिए एक अर्जी मिली है। मंत्रालय ने बताया कि इस अर्जी पर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया गया है। यह प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भले ही सरकारी नीति चुप है, पर PPP कॉन्ट्रैक्ट्स की कानूनी बाध्यता सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
यह जानकारी उन निवेशकों के लिए अहम है जो बड़े एयरपोर्ट पोर्टफोलियो वाली कंपनियों पर नजर रख रहे हैं, जैसे कि अडानी ग्रुप। हालांकि ग्रुप ने पहले कहा था कि वे फिलहाल ऐसी कोई मंजूरी नहीं मांग रहे हैं, पर सरकार का यह रुख भविष्य में इस तरह के विस्तार के लिए एक रास्ता खोलता है।
प्रतिस्पर्धा का सवाल
यह मुद्दा फेयर कंपटीशन (Fair Competition) से जुड़ा है। आलोचकों का कहना है कि जो कंपनी एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और एयरलाइन दोनों को नियंत्रित करती है, उसे स्लॉट आवंटन (Slot Allocation) या ग्राउंड हैंडलिंग सेवाओं में अनुचित लाभ मिल सकता है। ऐसे में, कॉन्ट्रैक्ट्स में किसी भी तरह की ढील के लिए रेगुलेटर्स से कड़ी जांच की उम्मीद है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि एयरपोर्ट्स सभी एयरलाइंस के लिए समान रूप से खुले रहें।
आगे क्या?
निवेशकों के लिए असली खबर राष्ट्रीय उड्डयन नीति में बदलाव की नहीं, बल्कि एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया को सौंपी गई किसी भी औपचारिक माफी के अनुरोध के नतीजे की होगी। सरकार इन कॉन्ट्रैक्ट्स में बदलाव की अनुमति देती है या नहीं, और किन शर्तों पर, यह तय करेगा कि एयरपोर्ट ऑपरेटर्स एयरलाइन ऑपरेशंस में कितना विस्तार कर सकते हैं।
