सरकारी विनिवेश में नया दांव: FY27 में ₹52,000 करोड़ जुटाए, LIC OFS बना बड़ी वजह

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
सरकारी विनिवेश में नया दांव: FY27 में ₹52,000 करोड़ जुटाए, LIC OFS बना बड़ी वजह

भारत सरकार ने विनिवेश (Disinvestment) की अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। अब बड़े, एकमुश्त सौदों के बजाय, सरकार छोटी-छोटी हिस्सेदारी बेचकर पैसा जुटा रही है। चालू वित्तीय वर्ष (FY27) के पहले चार महीनों में ही सरकार ₹52,000 करोड़ जुटा चुकी है, जिसमें LIC के ऑफर फॉर सेल (OFS) का बड़ा योगदान रहा। निवेशकों के लिए, सरकारी कंपनियों के शेयरों में अब सप्लाई और डिस्काउंट प्राइसिंग जैसे फैक्टर पर नजर रखनी होगी।

विनिवेश की बदली रणनीति, सरकारी खजाने में आई रौनक

केंद्र सरकार अब पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (PSUs) में अपनी हिस्सेदारी को मैनेज करने का तरीका बदल चुकी है। बड़े पैमाने पर सरकारी कंपनियों को बेचने या रणनीतिक बिक्री के बजाय, सरकार अब छोटी-छोटी हिस्सेदारी को बार-बार बेच रही है। इस नई रणनीति का असर सरकारी खजाने पर साफ दिख रहा है। अधिकारियों का कहना है कि चालू वित्तीय वर्ष (FY27) के पहले चार महीनों में ही ₹52,000 करोड़ से ज्यादा की रकम जुटाई जा चुकी है, जिससे सालाना ₹80,000 करोड़ के लक्ष्य को पाना आसान दिख रहा है।

OFS के जरिए तेजी से हो रही बिक्री

इस रणनीति के लिए 'ऑफर फॉर सेल' (OFS) सबसे पसंदीदा तरीका बन गया है। यह सरकार को स्टॉक एक्सचेंज पर अपनी हिस्सेदारी का एक हिस्सा तेजी से और कम नियामकीय बाधाओं के साथ बेचने की सुविधा देता है, जो पूरी तरह से पब्लिक ऑफरिंग की तुलना में कहीं आसान है। इस रणनीति की सबसे बड़ी मिसाल लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (LIC) में 6.5% हिस्सेदारी की बिक्री रही, जिससे अकेले सरकार को ₹31,552 करोड़ मिले। LIC के अलावा, कोल इंडिया (Coal India), आईआरएफसी (IRFC), एनएचपीसी (NHPC), एनएलसी इंडिया (NLC India), सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया (Central Bank of India) और जीआईसी री (GIC Re) जैसी अन्य सरकारी कंपनियों ने भी अपनी हिस्सेदारी बेची है, जिससे करीब ₹20,000 करोड़ और मिले हैं।

यह बदलाव तेजी और सरलता की जरूरत से प्रेरित है। लिस्टेड कंपनियों में छोटी हिस्सेदारी बेचना, पूरे बिजनेस के लिए नया रणनीतिक खरीदार खोजने की तुलना में कहीं ज्यादा आसान और कम अस्त-व्यस्त करने वाला है।

OFS का निवेशकों पर असर

निवेशकों के लिए, यह नया तरीका फायदे और नुकसान दोनों लेकर आया है। एक तरफ, सरकार अपनी हिस्सेदारी से वैल्यू अनलॉक कर रही है और PSU शेयरों की लिक्विडिटी (तरलता) बढ़ा रही है। वहीं, शेयरधारकों को कुछ जोखिमों से भी सावधान रहना चाहिए।

पहला है 'सप्लाई ओवरहैंग' (supply overhang) का मसला। जब सरकार OFS के जरिए बड़ी संख्या में शेयर बेचती है, तो बाजार में अचानक शेयरों की उपलब्धता बढ़ने से स्टॉक की कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। दूसरा, OFS सौदों में अक्सर बड़े निवेशकों को आकर्षित करने के लिए मौजूदा बाजार मूल्य से कुछ डिस्काउंट (छूट) पर शेयर बेचे जाते हैं। यह डिस्काउंट कीमतों में तुरंत गिरावट ला सकता है, क्योंकि बाजार नई कीमत पर एडजस्ट होता है।

यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि यह पूरी तरह से निजीकरण (privatization) नहीं है। कई मामलों में, सरकार अभी भी बहुमत हिस्सेदारी रखती है। इसका मतलब है कि निवेशकों को ज्यादा लिक्विडिटी का फायदा तो मिलेगा, लेकिन उन्हें मैनेजमेंट के तरीके या मालिकाना हक में बड़े बदलाव की उम्मीद शायद नहीं करनी चाहिए, जो कि पूर्ण निजीकरण के साथ आता है।

भविष्य को देखते हुए, सरकार का वित्तीय स्वास्थ्य इन बाजार-आधारित कमाई पर निर्भर करेगा। अगर बाजार में अस्थिरता आती है, तो इन हिस्सों को आकर्षक कीमतों पर बेचना मुश्किल हो सकता है। निवेशकों को आने वाली हिस्सेदारी बिक्री की तारीखों और सरकार द्वारा तय की जाने वाली फ्लोर प्राइस (floor price) पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि ये कारक इन PSU शेयरों की छोटी अवधि की कीमतों को सीधे तौर पर प्रभावित करेंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.