Ministry of Statistics (MoSPI) अब एजुकेशन और हेल्थकेयर सेक्टर में हो रहे खर्चों को ट्रैक करने के लिए UPI ट्रांजेक्शन डेटा का इस्तेमाल करेगी। यह कदम इकोनॉमिक डेटा में आ रही गैप को भरने के लिए उठाया गया है, लेकिन नए UPI फीस स्ट्रक्चर से लेनदेन की संख्या पर असर पड़ सकता है।
भारत सरकार ने देश की आर्थिक गतिविधियों की निगरानी के तरीके में एक बड़ा बदलाव करने का ऐलान किया है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने फैसला किया है कि अब 'Index of Services Production' (ISP) में UPI ट्रांजेक्शन डेटा को शामिल किया जाएगा। मर्चेंट कैटेगरी कोड्स की मदद से सरकार यह समझ पाएगी कि एजुकेशन और हेल्थकेयर जैसे महत्वपूर्ण सेक्टरों में लोग कितना और कहां खर्च कर रहे हैं।
क्यों लिया गया यह फैसला?
एजुकेशन और हेल्थकेयर सेक्टर भारतीय अर्थव्यवस्था का करीब 10% हिस्सा हैं। अब तक इनका रियल-टाइम डेटा मिलना काफी मुश्किल था क्योंकि स्कूल एनरोलमेंट और प्राइवेट हेल्थकेयर खर्च की जानकारी बहुत देरी से मिलती है। अब मंत्रालय स्कूलों, यूनिवर्सिटीज और हॉस्पिटल्स के प्राइवेट ट्रांजेक्शन को ट्रैक कर महंगाई के हिसाब से एडजस्ट करेगा, जिससे अर्थव्यवस्था का सटीक अंदाजा लग सकेगा।
सरकार कैसे रखेगी नजर?
यह डेटा सिस्टम सरकारी और प्राइवेट खर्चों के बीच अंतर करेगा। जहां UPI डेटा से आम लोगों और हाउसहोल्ड का खर्च पता चलेगा, वहीं सरकारी खर्च के लिए सरकार Public Financial Management System (PFMS) का इस्तेमाल जारी रखेगी। यह दोहरी नीति इसलिए जरूरी है क्योंकि शिक्षा क्षेत्र में 65.6% और स्वास्थ्य क्षेत्र में 42.7% योगदान सरकार का ही होता है।
निवेशकों के लिए जोखिम (Risk Factor)
जुलाई 2026 में शुरू हुए इस ISP इंडेक्स का लक्ष्य सर्विस सेक्टर की 60% कवरेज को बढ़ाकर 78.4% करना है। हालांकि, 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाला नया मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) और उस पर लगने वाला 18% GST चिंता का विषय है। अगर मर्चेंट्स या यूजर एक्स्ट्रा फीस से बचने के लिए कैश का इस्तेमाल बढ़ाते हैं, तो सरकार के डेटा में 'नॉइस' (अस्पष्टता) आ सकती है। बाजार की नजर अब इस पर है कि डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम इस नए फीस स्ट्रक्चर के साथ कैसे तालमेल बिठाता है।
