सरकार के पास **₹1 ट्रिलियन** का RDIF फंड तो है, लेकिन सख्त खरीद नियमों (Procurement Rules) के कारण डीप-टेक स्टार्टअप्स को अपना पहला ग्राहक ढूंढने में पसीने छूट रहे हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि जनरल फाइनेंशियल रूल्स (GFR) में बदलाव ही स्टार्टअप्स को ग्लोबल प्लेयर बना सकता है।
भारत के डीप-टेक सेक्टर को ग्लोबल लीडर बनाने की कवायद तेज हो गई है। सरकार ने ₹1 ट्रिलियन का रिसर्च, डेवलपमेंट और इनोवेशन फंड (RDIF) लॉन्च किया है, जिससे स्टार्टअप्स को मिल रही पूंजी की कमी तो दूर हो गई है, लेकिन अब एक नई मुसीबत 'प्रोक्योरमेंट पैराडॉक्स' बनकर सामने आई है।
'फर्स्ट कस्टमर' का महत्व
डीप-टेक स्टार्टअप्स, जो एडवांस्ड डायग्नोस्टिक्स या सेंसर जैसी जटिल तकनीक पर काम करते हैं, अक्सर अपनी क्वालिटी साबित करने के बाद भी सरकारी ऑर्डर पाने में नाकाम रहते हैं। इसकी मुख्य वजह वर्तमान 'L1 मॉडल' है, जहां सबसे कम बोली लगाने वाले को काम मिलता है। ऐसे में नई तकनीक लाने वाले स्टार्टअप्स, पुरानी स्थापित कंपनियों के सामने टिक नहीं पाते। दुनिया भर में सफल मॉडल यही रहा है कि सरकार खुद 'पहला ग्राहक' बनकर स्टार्टअप की तकनीक को मान्यता देती है। भारत में भी रेलवे और रक्षा मंत्रालय (Ministry of Defence) जैसे बड़े संस्थान इसके लिए सबसे बेहतर प्लेटफॉर्म हो सकते हैं।
नियमों को आधुनिक बनाने की जरूरत
भारत में सरकारी खर्च का पूरा ढांचा जनरल फाइनेंशियल रूल्स (GFR) पर टिका है। ये नियम काफी कठोर हैं और आरएंडडी (R&D) की अनिश्चितताओं के साथ मेल नहीं खाते। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अब GFR में 'आउटकम-बेस्ड प्रोक्योरमेंट' का नया चैप्टर जोड़ना बेहद जरूरी है।
अगर सरकार तकनीकी स्पेसिफिकेशन तय करने के बजाय 'समस्या के समाधान' पर ध्यान दे और परफॉर्मेंस माइलस्टोन को आधार बनाए, तो स्टार्टअप्स को बड़ी राहत मिलेगी। इस बदलाव से न केवल स्टार्टअप्स को रेवेन्यू मिलेगा, बल्कि प्राइवेट निवेशकों का भरोसा भी बढ़ेगा कि सरकार घरेलू इनोवेशन को अपनाने के लिए तैयार है।
