केंद्र सरकार ने **₹92,000 करोड़** के Great Nicobar प्रोजेक्ट को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। एनवायरमेंटल क्लियरेंस और ट्राइबल राइट्स से जुड़े विवाद ने इस बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर संकट के बादल खड़े कर दिए हैं।
कानूनी विवाद की मुख्य वजह
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी दाखिल की है जिसमें कलकत्ता हाई कोर्ट द्वारा जारी उस कार्यवाही को रोकने की मांग की गई है, जो ₹92,000 करोड़ के Great Nicobar इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट से संबंधित है। हाई कोर्ट वर्तमान में उन याचिकाओं की समीक्षा कर रहा है, जिनमें इस प्रोजेक्ट को मिली एनवायरमेंटल मंजूरी और प्रक्रियात्मक पहलुओं को चुनौती दी गई है। इस महत्वाकांक्षी योजना का मकसद निकोबार द्वीप को एक बड़े मैरीटाइम और लॉजिस्टिक्स हब के रूप में विकसित करना है।
प्रोजेक्ट का दायरा और विरोध
यह प्रोजेक्ट कई सेक्टरों को कवर करता है, जिसमें गैलाथिया बे (Galathea Bay) पर इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एक एयरपोर्ट, टाउनशिप और पावर प्लांट का निर्माण शामिल है। मलक्का जलडमरूमध्य के पास होने के कारण यह भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। हालांकि, इसे पर्यावरणविदों और सिविल सोसायटी का कड़ा विरोध झेलना पड़ रहा है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इस प्रोजेक्ट में 'फॉरेस्ट राइट्स एक्ट 2006' का उल्लंघन हुआ है और यह संवेदनशील समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र व जनजातीय समुदायों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
इंफ्रा सेक्टर के लिए रिस्क
इन्वेस्टर्स और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की कंपनियों के लिए यह मामला 'एक्जीक्यूशन रिस्क' (Execution Risk) की याद दिलाता है। जब सरकार के बड़े प्रोजेक्ट्स कानूनी और एनवायरमेंटल विवादों में फंसते हैं, तो उनकी टाइमलाइन अनिश्चित हो जाती है। लंबी कानूनी लड़ाई का असर प्रोजेक्ट की लागत और भविष्य में होने वाली कमाई (Cash Flows) पर पड़ सकता है।
इन्वेस्टर्स क्या नजर रखें?
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर अक्टूबर 2026 की शुरुआत में सुनवाई हो सकती है। निवेशकों की नजर इस बात पर होगी कि क्या कोर्ट कार्यवाही पर स्टे लगाता है या हाई कोर्ट की सुनवाई जारी रहती है। यदि कोर्ट नए एनवायरमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट के निर्देश देता है, तो प्रोजेक्ट की लागत और समय सीमा दोनों में बड़ा बदलाव आ सकता है।
