शुगर सेक्टर में मचे सियासी घमासान के बीच कांग्रेस ने ₹36,000 करोड़ के स्कैम का आरोप लगाया है। सरकार ने इन दावों को खारिज करते हुए कीमतों को काबू में करने के लिए ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट और स्टॉक लिमिट जैसे बड़े कदम उठाए हैं, जिस पर निवेशकों की नजरें टिकी हैं।
देश में चीनी की बढ़ती कीमतों को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है। 27 अगस्त 2026 को इंडियन नेशनल कांग्रेस ने सरकार पर ₹36,000 करोड़ के 'शुगर स्कैम' का गंभीर आरोप लगाया है। विपक्ष का कहना है कि इथेनॉल प्रोडक्शन के लिए गन्ने का डायवर्जन और सरकारी नीतियों में लापरवाही के चलते बाजार में चीनी की किल्लत पैदा हुई है, जिसका फायदा मुनाफाखोर उठा रहे हैं।
सरकार ने उठाए कड़े कदम
सरकार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 सीजन में गन्ने का प्रोडक्शन 306 लाख मीट्रिक टन (LMT) रहने का अनुमान है, जो शुरुआती 343 LMT के लक्ष्य से काफी कम है। जुलाई के अंत से अगस्त के बीच रिटेल कीमतों में 15-20% की बढ़ोतरी को देखते हुए सरकार ने दो बड़े फैसले लिए हैं:
- ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट: घरेलू सप्लाई बढ़ाने के लिए 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट की मंजूरी दी गई है।
- स्टॉक लिमिट: थोक डीलरों के लिए सख्त स्टॉक लिमिट लागू कर दी गई है, जो 30 नवंबर 2026 तक प्रभावी रहेगी। इसका मकसद त्योहारी सीजन के दौरान जमाखोरी को रोकना है।
इथेनॉल पॉलिसी और निवेशकों के लिए रिस्क
बहस का मुख्य केंद्र सरकार का E20 इथेनॉल-ब्लेंडिंग मैंडेट है। आलोचकों का मानना है कि इथेनॉल की तरफ ज्यादा झुकाव से चीनी उत्पादन प्रभावित हुआ है। निवेशकों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है। स्टॉक लिमिट और संभावित प्राइस कंट्रोल के कारण शुगर मिलों के मार्जिन और इन्वेंट्री टर्नओवर पर दबाव आ सकता है। साथ ही, इंपोर्ट बढ़ने से स्थानीय स्तर पर चीनी की कीमतों पर एक सीलिंग (दबाव) बन सकती है। अब बाजार की नजर इस बात पर है कि इंपोर्टेड चीनी का असर कीमतों पर कितना पड़ता है और भविष्य में इथेनॉल डायवर्जन को लेकर सरकार क्या रुख अपनाती है।
