इंटरनेशनल क्लाइमेट फ्रेमवर्क में एक बड़ा लूपहोल है, जिसके कारण मिलिट्री ऑपरेशंस को कार्बन उत्सर्जन की रिपोर्टिंग से छूट मिली हुई है। इससे ग्लोबल डीकार्बोनाइजेशन डेटा में एक बड़ा गैप पैदा हो गया है, जो नेट-जीरो लक्ष्यों के लिए चुनौती बना हुआ है।
रिपोर्टिंग का लूपहोल
साल 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल (Kyoto Protocol) के समय से ही डिफेंस सेक्टर को नेशनल कार्बन इन्वेंटरी से एक स्ट्रक्चरल छूट मिली हुई है। यह नीतिगत खामी आज के पेरिस एग्रीमेंट (Paris Agreement) के तहत भी जारी है। नतीजतन, मिलिट्री द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले भारी ईंधन, जैसे नौसेना के ऑपरेशन और फाइटर जेट्स का धुआं, ग्लोबल क्लाइमेट प्रोग्रेस डेटा से पूरी तरह गायब है।
आर्थिक प्रभाव और ESG जोखिम
Conflict and Environment Observatory की एक रिसर्च के मुताबिक, अगर दुनिया भर की मिलिट्री के उत्सर्जन को एक देश माना जाए, तो यह दुनिया की टॉप इंडस्ट्रियल इकोनॉमीज में शामिल होगा। ESG-फोक्स्ड इन्वेस्टर्स के लिए यह एक बड़ी चिंता है, क्योंकि जहां एक ओर आम इंडस्ट्रीज पर नेट-जीरो (Net-Zero) मैंडेट्स का सख्त दबाव है, वहीं डिफेंस सेक्टर पारदर्शिता के दायरे से बाहर है।
संघर्ष वाले क्षेत्रों पर असर
यह केवल अकाउंटिंग का मसला नहीं है। यूक्रेन जैसे संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में, मिलिट्री एक्टिविटीज के कारण बुनियादी ढांचे (Infrastructure) का पतन हो रहा है। यहां निगरानी उपकरणों का नष्ट होना और स्थानीय फायरफाइटिंग सिस्टम का ठप पड़ना, मिलिट्री के सीधे धुएं से भी ज्यादा खतरनाक पर्यावरणीय परिणाम पैदा कर रहा है।
भविष्य के संकेत
जैसे-जैसे सरकारें नेट-जीरो लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कार्बन रिपोर्टिंग मानकों को कड़ा कर रही हैं, इस लूपहोल को बंद करने का दबाव बढ़ सकता है। इन्वेस्टर्स के लिए यह ध्यान रखना जरूरी है कि अगर भविष्य में मिलिट्री कार्बन उपयोग को रिपोर्टिंग के दायरे में लाया जाता है, तो इसका सीधा असर डिफेंस बजट, एनर्जी कंजम्पशन और सप्लाई चेन की अनुपालन लागत (Compliance Costs) पर पड़ेगा।
