साल 2026 में ग्लोबल मार्केट ने तमाम भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद **12%** की बढ़त हासिल की है, लेकिन इसके ठीक उलट भारतीय शेयर बाजार अपनी **25 साल** की सबसे लंबी गिरावट के दौर से गुजर रहा है। विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली, महंगे क्रूड ऑयल और US बॉन्ड यील्ड में उछाल ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
ग्लोबल मार्केट की मजबूती का राज
साल 2026 में ग्लोबल इक्विटी मार्केट ने सबको हैरान करते हुए 12% से ज्यादा का रिटर्न दिया है। इस मजबूती के पीछे चार मुख्य स्तंभ हैं: सरकारों पर व्यापार नीतियों को संतुलित रखने का दबाव, मजबूत सप्लाई चेन, केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों का कुशल प्रबंधन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में हो रहा भारी निवेश। AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़े आर्थिक झटकों से बचा लिया है।
भारत क्यों है दबाव में?
ग्लोबल रेजिलिएंस के उलट, भारतीय बाजारों के लिए स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। Sensex और Nifty ने लगातार 8 हफ्तों की गिरावट दर्ज की है, जो पिछले 25 वर्षों में सबसे लंबा दौर है। इस बिकवाली की मुख्य वजह ग्लोबल लिक्विडिटी का शिफ्ट होना है। विदेशी निवेशकों (FIIs) ने केवल सितंबर 2026 के आखिरी दिनों में ही बाजार से ₹20,000 करोड़ से अधिक की पूंजी निकाल ली है।
चिंता के मुख्य कारण
- क्रूड ऑयल: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल $100 प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है। भारत के लिए यह आयात बिल को भारी बनाता है और मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट को बढ़ाता है।
- US बॉन्ड यील्ड: अमेरिका का 10-year Treasury yield बढ़कर 5% के पार चला गया है, जो 2007-09 के फाइनेंशियल क्राइसिस के पहले के स्तर जैसा है। इससे सुरक्षित रिटर्न की तलाश में विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालकर अमेरिकी डेट की ओर रुख कर रहे हैं।
आगे क्या होगा?
भविष्य में निवेशकों को विदेशी फंड फ्लो, क्रूड ऑयल की कीमतों और केंद्रीय बैंकों के इन्फ्लेशन कमेंट्री पर बारीकी से नजर रखनी होगी। हालांकि AI-आधारित निवेश चक्र एक सुरक्षा कवच का काम कर रहा है, लेकिन घरेलू बाजार की रिकवरी पूरी तरह से कॉर्पोरेट अर्निंग्स और FIIs के आउटफ्लो पर निर्भर करेगी।
