Global Market 2026: ताइवान-दक्षिण कोरिया में AI की धूम, Nifty 50 क्यों पड़ रहा है पीछे?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Global Market 2026: ताइवान-दक्षिण कोरिया में AI की धूम, Nifty 50 क्यों पड़ रहा है पीछे?

साल 2026 में ग्लोबल मार्केट में एक बड़ी खाई देखने को मिली है। AI और सेमीकंडक्टर की भारी डिमांड के चलते ताइवान और दक्षिण कोरिया के बाजार में जबरदस्त उछाल आया है, जबकि भारत का Nifty 50 विदेशी निवेशकों की निकासी और घरेलू दबावों के कारण गिरावट का सामना कर रहा है।

साल 2026 में ग्लोबल इक्विटी मार्केट का परिदृश्य दो ध्रुवों में बंटा नजर आ रहा है। एक तरफ वो देश हैं जो टेक्नोलॉजी सेक्टर में अपनी धाक जमाए हुए हैं, तो दूसरी तरफ उन बाजारों की मुश्किल है जो व्यापक आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं।

एशिया में AI और टेक का जलवा

ताइवान के 'वेटेड इंडेक्स' और दक्षिण कोरिया के 'KOSPI' की शानदार परफॉर्मेंस के पीछे उनकी सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सेक्टर में बादशाहत है। AI हार्डवेयर की मांग इतनी ज्यादा है कि ताइवान का इंडेक्स अब तक 60% से ज्यादा की बढ़त दर्ज कर चुका है। हालांकि, इन बाजारों में जोखिम भी कम नहीं है। अक्टूबर 2026 में KOSPI में आई गिरावट यह बताती है कि अत्यधिक टेक-फोक्स्ड पोर्टफोलियो में उतार-चढ़ाव कितना तेज हो सकता है।

भारतीय बाजार पर दबाव की वजह

पूर्व एशियाई बाजारों के उलट, भारतीय इंडेक्स Nifty 50 में इस साल डबल-डिजिट गिरावट देखने को मिली है। इसके पीछे मुख्य वजह विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की लगातार बिकवाली है। ये निवेशक अपनी पूंजी उन बाजारों में शिफ्ट कर रहे हैं, जहां उन्हें टेक सेक्टर में ज्यादा ग्रोथ दिख रही है।

भारत की चुनौती सिर्फ विदेशी निवेश की नहीं, बल्कि कुछ मैक्रोइकोनॉमिक फैक्टर्स भी हैं। ग्लोबल ऑयल की कीमतों में उछाल ने इंपोर्ट बिल बढ़ा दिया है, वहीं रुपये में कमजोरी ने विदेशी पूंजी के प्रवाह को और जटिल बना दिया है। भारत के पास सर्विसेज और मैन्युफैक्चरिंग की मजबूती तो है, लेकिन सेमीकंडक्टर चिप मैन्युफैक्चरिंग में वो सीधा एक्सपोजर नहीं है, जो ताइवान या कोरिया को रिकॉर्ड तोड़ तेजी दिला रहा है।

निवेशकों के लिए सबक

बाजार का इतिहास गवाह है कि इंडेक्स का प्रदर्शन अक्सर कई आंतरिक जटिलताओं को छिपा लेता है। जहां एक तरफ ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड बाजार अपनी कमाई की अस्थिरता से निपट रहे हैं, वहीं भारत के लिए करेंसी स्टेबिलिटी और ऑयल की कीमतें अहम बनी हुई हैं। अब सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या भारतीय कंपनियों की अर्निंग्स ग्रोथ विदेशी निवेशकों के आउटफ्लो की भरपाई कर पाएगी या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.